Friday, September 18, 2020
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पर्यावरण

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पर्यावरण क्या है ?

पर्यावरण शब्द अंग्रेजी भाषा के Environment का  हिन्दी रूपान्तर है । पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों “परि” तथा “आवरण” से मिलकर बना है । “परि” का अर्थ  “हमारे चारों ओर” है तथा आवरण का अर्थ “परिवेश” है । अर्थात् पर्यावरण हमारे चारों ओर व्याप्त है तथा हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर सम्पादित होती है तथा हमें अपनी समस्त क्रियाओं से पर्यावरण को प्रभावित करते हैं । पर्यावरण उन सभी रासायनिक, जैविक व भौतिक कारकों की समष्टिगत् इकाई है जो समस्त जीवधारियों या पारितन्त्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं और उनके जीवन, रूप तथा जीविता को तय करते हैं ।

पर्यावरण के जैविक संघटक –

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जीवाणु, पेड-पौधे,जीव- जन्तु आदि पर्यावरण के जैविक संघटक हैं ।

पर्यावरण के अजैविक संघटक –

तालाब, सागर, पर्वत, मिट्टी, नदी, समुद्र, चट्टानें, जलवायु, हवा, पानी आदि पर्यावरण के अजैविक संघटक हैं ।

पर्यावरण संरक्षण की समस्या –

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आधुनिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में अत्यन्त तेजी से होने वाली प्रगति तथा नई-नई खोजों के कारण आज मनुष्य प्रकृति पर विजय पाना चाहता है । तेजी से औद्योगिकीकरण हो रहा है । इन्ही कारणों से प्राकृतिक का सन्तुलन दिन-प्रतिदिन बिगड रहा है । मनुष्य द्वारा दिन- प्रतिदन प्राकृतिक सन्तुलन की उपेक्षा की जा रही है । तेजी से जनसंख्या बढ रही है । औद्योगीकरण बढ रहा है । वनों का तेजी से कटान हो रहा है ।

पर्यावरण संरक्षण का महत्व –

पृथ्वी के प्राकृतिक परिवेश तथा मानव एवं जीव जन्तुओं के जीवन से पर्यावरण का काफी घनिष्ठ सम्बन्ध है । मानव द्वारा निरन्तर किये जा रहे पर्यावरण की उपेक्षा के कारण प्रदूषण अत्यन्त तेजी से बढ रहा है पृथ्वी तथा पर्यावरण तेजी से प्रदूषित होते जा रहे हैं । पृथ्वी का तापमान बढता जा रहा है, जलवायु परिवर्तित होती जा रही है । पृथ्वी के निरन्तर बढ रहे तापमान तथा पर्यावरण प्रदूषण को  नियन्त्रित करने के लिए अकेले वाहनों, उद्योगों और पावर प्लान्ट से होने वाले  उत्सर्जन में कटौती करना काफी नहीं होगा, कृषि पद्धतियों में बदलाव खेती और जंगल भी इसके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है । भूमि एक महत्वपूर्ण संसाधन है जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में  अहम भूमिका निभा सकता है । यदि उचित प्रबन्धन किया जाए तो पेड़, पौधे और मिट्टी प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड की भारी मात्रा को सोख सकते हैं ।     दिन-प्रतिदिन बढ रहे पर्यावरण प्रदूषण किसी एक व्यक्ति या विश्व के एक देश या राज्य द्वारा नियन्त्रित नही किया जा सकता । पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्पूर्ण विश्व को एकजुट होना पडेगा तभी  पर्यावरण संरक्षित किया जा सकता है । यदि समय रहते इस पर पर्याप्त ध्यान नही दिया गया तो निकट भविष्य में मानव सभ्यता का अन्त संभावित है ।

पर्यावरण संरक्षण के उपाय –

निरन्तर बढ रहे पर्यावरण प्रदूषण के कुछ दूरगामी दुष्प्रभाव मानव सभ्यता के लिए अत्यन्त घातक हैं । जैसे- आणविक विस्फोटों से उत्पन्न होने वाली रडियोधर्मिता का प्रभाव, वायुमणडल में मौजूद ओजोन परत की हानि,  वायुमण्डल का ताप बढ जाना आदि अत्यन्त घातक दुष्प्रभाव हैं । प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव के रूप में पेड-पौधों का नष्ट होना, जल, वायु तथा परिवेश का नष्ट होना एवं मनुष्य का विभिन्न रोगों से ग्रसित होना आदि सम्मिलित है । कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ तथा प्लास्टिक आदि के कचरे से निरन्तर प्रदूषण बढ रहा है । कारखानों से निकलने वाले पानी में घुले हानिकारक रासायनिक तत्व नदियों तथा समुद्र के पानी में मिलकर पानी को विषाक्त कर रहे हैं । उसी विषाक्त पानी की सिंचाई से  उपजाऊ भूमि भी विषाक्त हो रही है तथा उक्त भूमि में पैदा होने वाली फसल तथा साग-सब्जियों के पोषक तत्व नष्ट होकर विषाक्त हो रही हैं । मनुष्य इन्ही फसलों तथा साग-सब्जियो का सेवन करता है जिसके कारण ये हानिकारक रसायन मनुष्य के खून को विषैला कर के नाना प्रकार की साध्य एवं दुसाध्य बीमारियों को जन्म दे रहे हैं । मनुष्य को पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए सर्वप्रथम जल को प्रदूशित होने से बचाना होगा जिसके लिए विभिन्न कारखानों  से निकलने वाला गन्दा एसं प्रदूषित जल, घरेलू गन्दा पानी, सीवर लाइन से निकला गन्दा पानी, मल आदि को नदियों तथा समुद्र में गिरने से रोंकने होगा ।

यदि मनुष्य पर्यावरण के लिए हानिकारक कृषि पद्धतियों में बदलाव कर दे, खाद्य पदार्थों की हो रही बर्बादी रोंक दें, वनों की अन्धाधुन्ध कटान बन्द कर दे,  कृषि योग्य भूमि पर वृक्षारोपण कर के वन प्रबन्धन में सुधार करे, वाहनों, उद्योगों और पावर प्लान्ट से होने वाले  उत्सर्जन में कटौती कर दे, बन्जर पडी भूमि को कृषि योग्य बना कर उस पर खेती करने लगे, प्लास्टिक उत्पादों, रसायनों व पेट्रो उत्पादों का कम से कम प्रयोग करने लगे, खेती के तरीकों में सुधार कर रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद, नीम की खाद इत्यादि का व्यापक प्रयोग करते हुए जैविक खेती को बढ़ावा देने लगे तो पर्यावरण प्रदूषण से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है  ।

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