Thursday, September 24, 2020
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मुद्रा स्फीति (Inflation)

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मुद्रा स्फीति का क्या अर्थ है  ?

मुद्रा स्फीति अंग्रेजी भाषा के Inflation” शब्द का हिन्दी रूपान्तर है ।  Inflation शब्द का अर्थ, “वृद्धि या फैलाव” है । इस प्रकार मुद्रा स्फीति का अर्थ, “बाजार में कीमतों में निरन्तर होने होने वाली वृद्धि” है ।

मुद्रा स्फीति की परिभाषा-

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बाजार में कीमतों तथा वस्तुओं के मूल्य में निरन्तर होने वाली वृद्धि को मुद्रा स्फीति कहते हैं ।

सैमुअल्सन के अनुसार– मुद्रा स्फीति का अभिप्राय उस समय से है जिसमें कीमतें बढ रही होती हैं ।

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पीटरसन के अनुसार– मुद्रा स्फीति का अभिप्राय कीमतों में होने वाली स्थायी तथा निरन्तर वृद्धि से है ।

केमर के  अनुसार– मुद्रा स्फीति का अभिप्राय मुद्रा या जमा मुद्रा की अधिकता से है ।

मुद्रा स्फीति के कारण

  • सस्ती मौद्रिक नीति सरकार की सस्ती  मौद्रिक नीति के कारण मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि हो जाती है जिससे सेवाओं तथा वस्तुओं की मांग बढ जाती है परन्तु उसकी आपूर्ति उस अनुपात में न बढ पाने के कारण वस्तु की कीमतों में वृद्धि हो जाती है ।
  • सार्वजनिक व्यय में वृद्धि– सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होने से क्रय शक्ति बढ जाती है जिससे वस्तुओं तथा सेवाओं की मांग भी बढ जाती है ।
  • व्यय योग्य आय में वृद्धि – जब समाज के कुछ लोग अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का उपभोग करके जीवन स्तर अपेक्षाकृत ऊंचा कर लेते हैं तो इसका अनुसरण दूसरे लोग भी करते हैं जिससे मांग तो बढ जाती है परन्तु मांग की तुलना में पूर्ति में वृद्धि कम होती है जिसके कारण वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है ।
  • घाटे की वित्त व्यवस्था- इस व्यवस्था में लोगों  की आय तो बढ जाती है परन्तु उस अनुपात में उत्पादन नही बढ पाता जिसके कारण वस्तुओं की कीमतें बढ जाती हैं । घाटे की वित्त व्यवस्था की नीति सरकार अपनी आय तथा खर्च के घाटे को पूरा करने के लिए अपनाती है । वर्तमान समय में भारत में मुद्रा स्फीति का मुख्य कारण घाटे की वित्त व्यवस्था है ।
  • करों में वृद्धि सरकार द्वारा करों में कमी कर दिये जाने पर लोगों की आय बढ जाती है जिसके कारण क्रय शक्ति बढ जाती है तथा लोग अधिक वस्तुओं की मांग करने लगते हैं । मांग बढने से वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ जाती हैं ।
  • सार्वजनिक ऋण में कमी- जब सरकार जनता से कम ऋण लेती है या ऋण माफ कर देती है तो जनता की क्रय शक्ति बढ जाती है जिसके कारण वस्तुओं की मांग बढ जाती है जिससे कीमतें बढ जाती है ।
  • काला धन- वह आय जिस पर सरकार को टैक्स नही दिया जाता अर्थात् सरकार को हिसाब नही दिया जाता, काला धन कहलाता है । काला धन से वस्तुओं की खरीददारी अधिक की जाती है जिसके कारण मांग में वृद्धि होती है जिसके कारण वस्तुओं के दाम बढ जाते हैं ।
  • निर्यात् में वृद्धि- निर्यात में वृद्धि होने से आय बढ जाती है परन्तु वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है जिसके कारण वस्तुओं के कीमतें बढ जाती हैं ।
  • जनसंख्या मे वृद्धि- जब देश में जनसंख्या वृद्धि की दर वस्तुओं के उत्पादन की दर से अधिक होती है तब वस्तुओं तथा सेवाओं की मांग बढ जाती है जिसके कारण वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ जाती है ।
  • खाद्यान्न में कमी- जब देश में किन्ही कारणों जैसे- बाढ या सूखा आदि के कारण कम खाद्यान्न पैदा होता है तो खाद्यान्न की मांग बढ जाती है जिसके कारण खाद्यान्न की कीमतें बढ जाती है ।
  • सरकार की कर नीति– जब सरकार किसी वस्तु पर विक्री कर बढा देती है तो उत्पादन की मांग स्थिर रहने पर वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ जाती है ।
  • औद्योगिक झगडे- जब किसी उद्योग में मालिक तथा मजदूरों के मध्य किसी वात को लेकर विवाद हो जाता है जो मजदूर हडताल कर देते हैं जिससे उत्पादन घट जाता है जिसके कारण कीमतें बढ जाती हैं ।
  • कृत्रिम अभाव– जब देश में जमाखोर व मुनाफाखोर वस्तुओं को अपने पास जमा कर के रख लेते हैं जो बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है जिसके कारण कीमतें बढ जाती हैं ।
  • कच्चे माल की कमी- जब देश में कच्चे माल की कमी हो जाती है तथा विदेशों से आयात भी नही हो पाता तब उत्पादन में कमी आ जाती है जिसके कारण कीमतें बढ जाती हैं ।
  • युद्ध काल- साधनों का प्रयोग युद्ध सामग्री के उत्पादन में होने का कारण वस्तुओं के उत्पादन में कमी आ जाती है जिसके कारण वस्तुओं के मूल्य में बढोत्तरी हो जाती है ।
  • उत्पादन में गतिरोध- जब किसी देश में ऊर्जा संसाधन जैसे- बिजली, कोयले आदि की पूर्ति कम हो जाती है तो यातायात के साधनों की उपलब्धता कम हो जाती है तब उत्पादन में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है  जिससे वस्तुओं की आपूर्ति घट जाती हैं तथा कीमतें बढ जाती हैं ।
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