Saturday, September 19, 2020
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भारत में आरक्षण की अवधारणा, आवश्यकता एवं उद्देश्य

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आरक्षण क्या है ?

भारत में सरकारी सेवाओं तथा संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न रखने वाले पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से सामाजिक, राजननैतिक तथा शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार द्वारा कानून के माध्यम से सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों, सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षणिक संस्थानों में पदों एवं सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली को आरक्षण कहा जाता है ।

भारत में आरक्षण की अवधारणा एवं आवश्यकता –

आरक्षण की अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि भारत में लम्बे समय से प्रचलित जाति प्रथा के कारण समाज के कुछ वर्गों को राजनैतिक तथा सामाजिक गतिविधियों के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया । जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो भारतीय संविधान ने ऐसे सामाजिक वर्गों को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के रूप में चिन्हित किया । भारतीय संविधान निर्माताओं का मानना था कि भारत में परम्परागत जाति प्रथा के व्यापक प्रचलन के कारण अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोग अत्यन्त पिछडे तथा दबे कुचले हुए हैं, इनका दमन एवं इनके अधिकारों का हनन हुआ है, लम्बे समय तक इन्हें तमाम प्रकार की सुविधाओं और स्वतन्त्रताओं जैसे- शिक्षा आदि से वंचित रखा गया जिसके कारण समाज में इन्हें अपेक्षित स्थान व मान सम्मान नहीं मिला । इन वर्गों को भारतीय समाज तथा भारतीय राष्ट्र के निर्माण में समान अवसर नहीं प्राप्त हुआ । इसीलिए भारतीय संविधान में राज्य की सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थानों और सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों को क्रमशः 15% और 7.5% आरक्षण कोटा 5 वर्ष के लिए निर्धारित किया गया और यह व्यवस्था की गयी कि इसके बाद इसका पुनरीक्षण किया जाएगा परन्तु आने वाली सरकारें इस व्यवस्था को लगातार बढ़ाती चली गई ।

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बाद में मण्डल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग को भी सरकारी नौकरियों और राज्य के सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण प्रदान किया गया । उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% हो सकती है

आरक्षण का उद्देश्य – आरक्षण का उद्देश्य शिक्षण संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में प्रवेश की योग्यता के मापदण्ड में कुछ कमी करके इन स्थानों पर समाज के आरक्षित उन वर्गों को प्रतिनिधित्व देना है जिनकी अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व बहुत कम है । इन वर्गों को चिन्हित करने के मापदण्ड कई हो सकते हैं परन्तु भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वंचित पिछड़े वर्गों को चिन्हित करने का सबसे भरोसेमन्द मापदण्ड जाति ही माना गया है ।

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