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भारतीय न्यायपालिका की संरचना (INDIAN JUDICIARY STRUCTURE)

भारतीय न्यायपालिका की संरचना (INDIAN JUDICIARY STRUCTURE)

हमारा देश भारत के तीन अति महत्वपूर्ण अंग- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका हैं। न्यायपालिका कानून का उल्लंघन करने वालों को न्यायोचित दण्ड से दण्डित करती है, विवादों को सुलझाती है, देश के सभी नागरिकों को समान न्याय सुनिश्चित कराती है तथा व्यवस्थापिका द्रारा बनाए गए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन कराती है जिसके परिणामस्वरूप अपराधों पर अंकुश लगता है तथा समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। नई दिल्ली में एक सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों में उच्च न्यायालय तथा जिलों में जिला न्य़ायालय एवं उसके अधीनस्थ न्यायालय स्थापित किये गये हैं।

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)

भारत में न्यायपालिका का शीर्ष सर्वोच्च न्यायालय है जिसकी स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेदR; 124 के अन्तर्गत 28 जनवरी 1950 को नई दिल्ली में की गई है जिसका प्रधान, प्रधान न्यायाधीश होता है तथा 30 अन्य न्यायाधीश भी होते हैं जिनके अवकाश ग्रहण करने की उम्र 65 वर्ष हैं। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा पद एवं गोपनीयता की शपथ भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिलाई जाती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-125 को अनुसारः सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों का निर्धारण भारतीय संसद द्वारा किया जाता है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का वेतन 3.5 लाख रूपये प्रतिमाह तथा अन्य न्यायाधीशों का वेतन 2.5 लाख रूपये प्रतिमाह है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 129 के अनुसारः सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय है जिसे अपने अवमान के लिए दण्ड देने की शक्तियां प्राप्त हैं। सर्वोच्च न्यायालय को उच्चतम न्यायालय भी कहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय नये मामलों के साथ-साथ विभिन्न उच्च न्यायालयों के विवादों की भी सुनवाई करता है। उच्च न्यायालय के किसी  निर्णय के विरुद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जाती है जिसके कारण सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय न्यायालय भी कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 137 के अनुसारः उच्चतम न्यायालय को निर्णयों या आदेशों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति प्राप्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 141 के अनुसारः उच्चतम न्यायालय के आदेश सम्पूर्ण भारत में प्रभावी होते हैं।

उच्च न्यायालय (High Court)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसारः भारत के प्रत्येक राज्य में उच्च न्यायालय की स्थापना की गई है जिन्हें प्रादेशिक न्यायालय भी कहा जाता है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के परामर्श से तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अवकाश ग्रहण करने की उम्र 62 वर्ष हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 219 के अनुसारः उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद एवं गोपनीयता की शपथ राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त किय़े गये व्यक्ति द्वारा करायी जाती है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2.5 लाख रूपये प्रतिमाह तथा अन्य न्यायाधीशों को 2.25 लाख रूपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। भारत के सबसे पुराने कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना वर्ष 1862 ई0  में की गई थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 215  के अनुसारः उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय है जिसे अपने अवमान के लिए दण्ड देने की शक्ति प्राप्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 227 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय को अपने अधिकारिता क्षेत्र के सभी न्यायालयों के अधीक्षण की शक्ति प्राप्त है।

उच्च न्यायालय में तीन प्रकार की पीठें होती है- एकल पीठ, खण्डपीठ तथा संवैधानिक पीठ । एकल पीठ में मात्र एक जज बैठता है । खण्डपीठ में दो से तीन जजों की बेंच होती है तथा संवैधानिक पीठ में कम से कम 5 जज होते हैं। जिला न्यायालय के किसी निर्णय के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय में की जाती है जिसके कारण उच्च न्यायालय को अपीलीय न्यायालय भी कहा जाता है।

जिला न्यायालय तथा उसके अधीनस्थ न्यायालय (District Court and its subordinate)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसारः जिला न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति सम्बन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राज्यपाल द्वारा की जाती है। जिला न्यायालय स्तर पर सिविल तथा आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए सिविल तथा सेशन कोर्ट अलग-अलग होते हैं जिनके विरुद्ध जांच, स्थानान्तरण तथा निलम्बन की शक्तियां उच्च न्यायालय में निहित होती हैं। पुराने लम्बित आपराधिक वादों तथा जघन्य अपराधों के त्वरित निस्तारण हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किए गए हैं। जिला अदालतों में लोक अदालतें भी होती हैं जिनके न्यायाधीश पदेन या सेवानिवृत्त जज तथा 2 सदस्य (एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा एक वकील) होते हैं। लोक अदालत में बीमा दावे तथा क्षतिपूर्ति से सम्बन्धित वादों का सीधे सुनवाई करके त्वरित निस्तारण किया जाता है जिसके निर्णय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई अपील नहीं की जा सकती है।

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