Friday, September 18, 2020
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विशेषज्ञों की राय के मूल्यांकन के सम्बन्ध में माननीय न्यायालयों के विभिन्न निर्णय (Various Judgements of Hon,ble Courts in related valuation of Expert Opinion)

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रुकमानन्द अजीत सारिया बनाम उषा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड ए0 आई0 आर0 1991 एन0 ओ0 सी0 108 गुवाहाटी में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः

खाली कारतूस की बरामदगी का पूर्णतया संन्देहास्पद होना तथा बन्दूक को भी दो माह से अधिक समय तक पुलिस अभिरक्षा में रखना तथा उसके पश्चात प्रक्षेपित विशेषज्ञ के पास भेजना जैसी परिस्थितियों में प्राक्षेपिक विशेषज्ञ की सैद्धान्तिक साक्ष्य पर विश्वास नहीं किया जा सकता ।

सन्तोष सिंह तथा अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1989) 1 दा0 नि0 प0 844 के अनुसारः

किसी हस्तलेख को विशेषज्ञ द्वारा पढ़वाये जाने हेतु जाने हेतु आवेदन किया गया । इस निमित्त आवेदन अपीलीय स्तर पर 10 वर्ष पश्चात किया गया था वहां विलम्ब के लिए सन्तोषजनक उत्तर न दिए जाने के कारण आवेदन निरस्त कर दिया गया ।

गिरीश विनायक राव बनाम शिवमूर्थ्पा ए0 आई0 आर0 2001 कर्नाटक 210 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः
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किसी तकनीकी मामले पर विशेषज्ञ की राय उचित है । इस मामले में जो चेक के अनादर से सम्बन्धित है, विचारण के स्तर पर विशेषज्ञ की राय अंगुलि छाप के विषय में लिया गया था ।

के0 लक्ष्मणन बनाम केबीचन्द्रन 2001 क्रिमिनल एल0 जे0 1549 (मद्रास) में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः

यद्यपि घायल साक्षियों की इन्जरी रिपोर्ट को इस आधार पर अस्वीकृत कर दिए जाने का तर्क किया गया कि वह छपे हुए सरकारी पेपर पर नहीं बनाए गये थे बल्कि सादे पेपर पर बनाए गए लेकिन जब यह प्रदर्शित कर दिया गया कि सरकारी अस्पतालों में छपे हुए प्रारूपों की कमी थी तब उसको अस्वीकृत करने योग्य नहीं माना गया ।

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अम्मीनी व अन्य बनाम केरल राज्य 1998 क्रिमिनल ला0 ज0 481 (सु0 को0) में माननीय न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः

यद्यपि विशेष साक्षी ने व्यथित अभियोक्त्री को उसके साथ बलात्कार का अपराध कारित किए जाने का प्रमाण पत्र दिया किन्तु विचारण के दौरान वह पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया क्योंकि उसने अभियुक्त को बचाने का प्रयास किया । ऐसी दशा में उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को प्रशासनिक कार्यवाही करने का निर्देश दिया गया ।

अमरजीत सिंह व अन्य बनाम दिल्ली प्रशासन, 1955 क्रिमिनल ला0 ज0 1623 (दिल्ली) में माननीय न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः

जहां किसी अपराध के संदर्भ में अभियुक्त व्यक्ति के अंगुली छाप को बढ़ाया गया एवं उसकी फोटोग्राफी कराई गई, परन्तु फोटोग्राफर की परीक्षा नहीं की गई थी, वहां उक्त साक्ष्य को अनुज्ञा नहीं प्रदान की जा सकती ।

सुरजन महतो बनाम बिहार राज्य 1998 (2) ईस्ट क्रि0 सी0 602 (एम0 सी0) में माननीय न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः

अंगुष्ठ चिन्ह के विवाद में न्यायालय द्वारा स्वीकार अंगुष्ठ चिन्ह से स्वतः की गई तुलना तथा उसके सन्दर्भ में दिया गया निष्कर्ष उचित नहीं  है । विधि एवं सतर्कता की मांग यह है कि वह विवादित अंगुष्ठ चिन्ह के सन्दर्भ में विशेषज्ञ की राय की अपेक्षा करें ।

मावे पल्ली अंजू माली स्टेट बनाम एपी 1999 क्रिमिनल ला0 ज0 4375 (आ0 प्र0) मेः

किसी दस्तावेज की शुद्धता के विषय में विशेषज्ञ की राय आमन्त्रित की गई । विशेषज्ञ ने एक तृतीय व्यक्ति के रूप में अपनी राय प्रस्तुत किया । यहां पर मामले की परिस्थितियों के अनुसार माननीय न्यायालय द्वारा इसे ग्राह्य माना गया ।

गुलजार अली बनाम स्टेट आफ एच0 पी0 1998(2) ए0 सी0 सी0 229 (एस0 सी0) में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः 

टाइपराइटर के विशेषज्ञ की राय साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगी ।

शिव देवी बनाम सुरजा देवी 1999 (2) ए0 सी0 सी0 31 (एम0 सी0) में माननीय न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः

जहां किसी वस्तु की परीक्षा करने हेतु विशेषज्ञ नियुक्त हुआ तथा उसने नमूने का परीक्षण किया और अपना निष्कर्ष दिया । वहां उस निष्कर्ष को साक्ष्य के रूप में ग्रहण किया जाना न्यायोचित होगा ।

जगदीश बुधरोजी पुरोहित बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र 1998 (2) ए0 सी0 सी0 648 (एस0 सी0) में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया किः

जहां अपराध कार्य में प्रयुक्त कुल्हाड़ी की बरामदगी की गई जिसमें रक्त लगा हुआ था, रक्त के विषय में विशेषज्ञ की राय ली गई । उक्त साक्ष्य को परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा अभिपुष्ट माना गया ।

गिरीश विनायक राव नायक बनाम् शिवमूर्थप्पा, ए0 आई0 आर0 2001 कर्नाटक 210 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः
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किसी मामले को सावित करने के लिए विशेषज्ञ की राय ली जा सकती है परन्तु विशेषज्ञ के रूप में सलाह देने वाला व्यक्ति कौशल या सान से युक्त होना चाहिए ।

स्टेट आफ हिमांचल प्रदेश बनाम जै लाल, 1999(2) ए0 सी0 सी0 723 (एस0सी0) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः

किसी मामले को साबित करने के लिए विशेषज्ञ की राय सुसंगत है परन्तु विशेषज्ञ को उस तकनीकी ज्ञान से पूर्णतः युक्त होना चाहिए जिस सम्बन्ध में उसकी राय मांगी गयी है ।

माया बंसल (मिस्ट्रेस) डाक्टर बनाम स्टेट आफ राजस्थान 2002 (1) क्रि0 एल0 आर0 (राजस्थान) 338: 2002(4) डब्ल्यू0 एल0 सी0 (राजस्थान) 693 : 2002 (2) ब्ल्यू0 एल0 एन0 376 के अनुसारः

उसके सम्बन्ध में चिकित्सकीय साक्ष्य विवादित किया जा सकता है जब जन्म प्रमाण पत्र उपलब्ध न हो ।

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