अर्थशास्त्र (ECONOMICS)

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ECONOMICS

अर्थशास्त्र (ECONOMICS)

सामाजिक विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग का अध्ययन किया जाता है अर्थशास्त्र कहलाती है।

  • प्रोफेसर सैम्यूल्सन के अनुसार : अर्थशास्त्र कला समूह में प्राचीनतम तथा विज्ञान समूह में नवीनतम वस्तुतः सभी सामाजिक विज्ञानों की रानी है।
  • ब्रिटिशअर्थशास्त्री अलफ्रेड मार्शल के अनुसारः अर्थशास्त्र मानव जाति के दैनिक जीवन का अध्ययन है।
  • लियोनेल रॉबिंसन के अनुसारः अर्थशास्त्र मानव स्वभाव के वैकल्पिक उपयोग वाले सीमित साधनों का अध्ययन किया जाता है।
  • प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के अनुसारः अर्थशास्त्र धन का विज्ञान है।

अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य के अर्थ सम्बन्धी सभी कार्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

अर्थशास्त्र का उद्देश्यः

अर्थशास्त्र का उद्देश्य विश्वकल्याण है तथा दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय है।

भारत में अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र एक अत्यन्त प्राचीन विद्या है। विष्णु पुराण में भारत की प्राचीन तथा प्रधान 18 विद्याओं में अर्शास्त्र की परिगणित है । कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक ऐसा ग्रन्थ है जो अर्थशास्त्र  विषय पर उपलब्ध क्रमबध्द ग्रन्थ है । इसलिए इसका सर्वाधिक महत्व है। आचार्य कौटिल्य चाणक्य के नाम से भी प्रसिद्ध है जो कि चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री थे। इनका ग्रन्थ अर्थशास्त्र लगभग 23 वर्ष पुराना माना जाता है। आचार्य कौटिल्य के मतानुसार अर्थशास्त्र का क्षेत्र पृथ्वी को प्राप्त करने तथा उसकी रक्षा करने के उपायों का विचार करना है। आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में ब्रह्मचर्य की दीक्षा से लेकर देशों की विजय करने की अनेक बातों का समावेश किया है।

भारतीय संस्कृत में चार पुरुषार्थों में अर्थ भी सम्मिलित है। जैन धर्म में अपरिग्रह का उपदेश दिया गया है। अपरिग्रह का अर्थ हैः बहुत अधिक धन का संग्रह न किया जाना।

चाणक्य सूत्र में कहा गया है किः सुख का मूल है धर्म। धर्म का मूल है अर्थ। अर्थ का मूल है राज्य। राज्य का मूल है इन्द्रियों पर विजय।  इन्द्रियजय का मूल है विनय। विनय का मूल है वृध्दों की सेवा करना।

अर्थशास्त्र के वर्तमान रूप में विकास पाश्चात्य देशों में हुआ।

एडम स्मिथ वर्तमान अर्थशास्त्र के जन्मदाता माने जाते हैं जिनके द्वारा वर्ष 1776 ईस्वी में प्रकाशित पुस्तक वेल्थ आफ नेशन्स में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, “प्रत्येक देश के अर्थशास्त्र का उद्देश्य उस देश की सम्पत्ति तथा शक्ति में वृध्दि करना है।

प्रोफेसर रॉबिंस अर्थशास्त्र को विज्ञान मानकर यह स्वीकार नहीं करते कि अर्थशास्त्र में ऐसी बातों पर विचार किया जाए जिसके द्वारा आर्थिक सुधारों के लिए मार्गदर्शन हो।

प्रोफेसर मार्शल तथा प्रोफेसर पीग्यू के अनुसार : अर्थशास्त्र का मुख्य विषय मनुष्य तथा उसकी आर्थिक उन्नति के लिए जिन जिन बातों की आवश्यकता पड़ती है उन सब पर विचार किया जाना आवश्यक है परन्तु राजनीतिक अर्थशास्त्र से अलग रखते हैं।

कार्ल मार्क्स के अनुसार : मनुष्य का श्रम ही उत्पत्ति का साधन है तथा पूंजीवादियों एवं जमीदारों का नाश करके मजदूरों की उन्नति चाहता है।

अर्थशास्त्रीय विवेचना का प्रयोग समाज से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों जैसे- अपराध, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, राजनीति, कानून, धार्मिक, सामाजिक संस्थान आदि क्षेत्रों में किया जाता है।

अर्थशास्त्र का क्या अर्थ है ?

अर्थशास्त्र संस्कृत भाषा के अर्थ तथा शास्त्र नामक शब्दों से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है धन का अध्ययन या धन का शास्त्र। अर्थात् धन का अध्ययन कराने वाले शास्त्र को अर्थशास्त्र कहा जाता है।

अर्थशास्त्र की मूल अवधारणाए

मूल्य

मूल्य की अवधारणा अर्थशास्त्र में प्रधान है जिसे मापने का तरीका वस्तु का बाजार भाव है। एडम स्मिथ ने श्रम को मूल्य के मुख्य स्रोत के रूप में परिभाषित किया। “मूल्य के श्रम सिद्धान्त” के अनुसारः किसी सेवा या वस्तु का मूल्य उसके उत्पादन में प्रयुक्त श्रम के बराबर होता है।

मांग तथा आपूर्ति

मांग किसी नियत अवधि में किसी उत्पाद की वह मात्रा है जिसे नियत मूल्य पर उपभोक्ता खरीदना चाहता है तथा खरीदने में सक्षम है। आपूर्ति किसी वस्तु की वह मात्रा है जिसे नियत समय में दिए गए मूल्य पर उत्पादक या विक्रेता बाजार में बेचने के लिए तैयार है। मांग तथा आपूर्ति को तालिका या ग्राफ के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

अर्थशास्त्र के कितने अंग हैं ?

पूर्व में अर्थशास्त्र के 4 प्रधान अंग : (1) उत्पादन (2 )उपभोग (3) विनिमय तथा (4) वितरण माने जाते थे। आधुनिक अर्थशास्त्र में पांचवा अंग राजस्व भी सम्मिलित किया गया है।

इस प्रकार वर्तमान समय में अर्थशास्त्र के पांच अंग हैः

  1. उत्पादन (Production)।
  2. उपभोग (Consumtion)।
  3.  विनिमय (Exchange) ।
  4. वितरण (Distribution)।
  5. राजस्व (Public Finance)।

उत्पादन वह आर्थिक क्रिया है जिसका सम्बन्ध वस्तुओं तथा सेवाओं की उपयोगिता या मूल्य में वृद्धि करने से है।

व्यक्तिगत या सामूहिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं की उपयोगिता का उपभोग किया जाना ही उपभोग है।

किसी वस्तु या उत्पादन के साधन का मुद्रा द्वारा क्रय विक्रय किया जाना विनिमय कहलाता है।

वितरण का तात्पर्य विभिन्न साधनों के सामूहिक सहयोग हुए  उत्पादन का विभिन्न साधनों से वितरण करना है।

राजस्व के अन्तर्गत लोक व्यय, लोक आय, लोक ऋण तथा वित्तीय प्रशासन आदि से सम्बन्धित समस्याओं के सम्बन्ध में अध्ययन किया जाता है।

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