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अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग-01)

अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग-01)

अन्वेषण के सम्बन्ध में समय-समय पर भारत के  माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों बहुत से अति महत्वपूर्ण निर्णय /मत / नजीर दी गयी हैं। ये महत्वपूर्ण निर्णय / मत / नजीरें निम्नलिखित है :-

स्टेट आफ मध्य प्रदेश बनाम मुबारक अली A.I.R. 1959 S.C. 707 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण का कार्य उसी समय आरम्भ हो जाता है जब किसी अपराध के घटित / कारित होने की जानकारी पुलिस अधिकारी को प्राप्त होती है।

यूनियन बैंक आफ इण्डिया बनाम प्रकाश पी. हिन्दुजा (2003) 6 S.C.C. 195 : 2003 S.C.C. (Criminal) 1314 के अनुसार : अन्वेषण करना पुलिस अधिकारी का कार्य है। अन्वेषण की रीति तथा प्रणाली सुनिशिचत करना अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का कार्य है। मजिस्ट्रेट को यथासम्भव विवेचना में हस्तक्षेप नही करना चाहिए।

M.J. Fitzerald : Handbook of Criminal Investigation (1977), p. 11 के अनुसारः अन्वेषण का सम्बन्ध आपराधिक कृत्यों से व्यथित / पीड़ित व्यक्तियों, साक्षियों तथा अपराध कारित करने वाले व्यक्तियों से होता है।

प्रोफेसर एन0 एस0 हेकड़े बनाम् लोकायुक्त बंगलौर A.I.R. 2004 N.O.C. 169 Kant में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसारः सी0 आर0 पी0 सी0 में वर्णित अन्वेषण तथा लोकायुक्त द्वारा किये जाने वाले अन्वेषण में अन्तर है । लोकायुक्त के द्वारा अन्वेषण में अपने विवेक तथा नैसर्गिक न्याय के सिध्दान्तों का प्रयोग किया जा सकता है।

सरदार बनाम स्टेट A.I.R. 1961 Cal 181 में माननीय न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसारः अन्वेषण निरन्तर चलने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है साक्ष्य के संकलन के आरम्भ होकर मजिस्ट्रेट के समक्ष रिपोर्ट के प्रस्तुतीकरण के साथ समाप्त होती है।

मनोहरलाल बनाम विनेश आनन्द (2001) 5 S.C.C. 407: 2001 S.C.C. (Criminal) 1322 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अभियुक व्यक्तियों के विरूध्द प्रसंज्ञान लेना और उन्हे अभियोजित करना सामाजिक दायित्व तथा अनिवार्यता है। यह सम्पूर्ण दायित्व अन्वेषण तथा अभियोजन एजेंसी पर है। अभियुक्त व्यक्ति का किसी भी कारण से बच निकलना मानव समाज के लिए घातक है। अन्वेषण में ऐसी कोई त्रुटि / कमी नही होनी चाहिए जिसका फायदा उठाकर अभियुक्त बच निकले।

स्टेट आफ उत्तर प्रदेश बनाम किसन (2005) 10 S.C.C. 420: A.I.R. 2005 S.C. 1250 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार :  समाज की सुरक्षा तथा अपराधों के निवारण के लिए दण्ड दिया जाना आवश्यक है। छोटे- मोटे आधारों पर दण्ड में उदारता बरता जाना उचित नही है।

स्टेट आफ उत्तर प्रदेश बनाम भगवन्त कशोर A.I.R. 1964 S.C. 221 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य किसी अपराध से सम्बन्धित साक्ष्य संकलित करना है। साक्ष्य के अभाव में किसी अभियुक्त के विरूध्द दोषारोंपण नहीं किया जा सकता है।

एस0 एन0 शर्मा बनाम विपिन कुमार तिवारी  (1970) S.C.C. 653: 1970 S.C.C. (Criminal) 258 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण में पूरी तरह छानबीन एवं साक्ष्य संकलन के द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति के विरूध्द कोई मामला बनता है या नही। मामले की तह में जाकर अप्रकट सत्य का पता लगाना ही अन्वेषण का मुख्य लक्ष्य होता है। यदि अन्वेषणकर्ताधिकारी अपने कर्तव्य से विमुख होकर दुर्भावनापूर्वक अन्वेषण का संचालन करता है तो उच्च न्यायालय ऐसे अन्वेषण को रद्द कर सकेगा।

जमना चौधरी बनाम स्टेट आफ बिहार (1974) 3 S.C.C. 774: 1974 S.C.C. (Criminal) 250 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण का उद्देश्य मामले की तह में जाकर निरापद सत्य का पता होता है, न कि ऐसे साक्ष्य एकत्रित करना जिससे कि अभियुक्त को देषसिध्द किया जा सके।

स्टेट आफ कर्नाटक बनाम अरुण कुमार अग्रवाल (2000) 1 S.C.C. 210: 2000 (Criminal) 135 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : किसी भी व्यक्ति के विरूध्द मात्र शंका या परिकल्पना के आधार पर मामला दर्ज कर अन्वेषण नही किया जाना चाहिए। सर्वप्रथम यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कोई अपराध घटित हुआ है या नही। केवल इस परिकल्पना के अधार पर कि कोई अपराध घटित हुआ होगा, अन्वेषण किया जाना उचित नही है।

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