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अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग- 02)

अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग- 02)

अन्वेषण के सम्बन्ध में समय-समय पर भारत के  माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों बहुत से अति महत्वपूर्ण निर्णय /मत / नजीर दी गयी हैं। ये महत्वपूर्ण निर्णय / मत / नजीरें निम्नलिखित है :-

स्टेट आफ मणिन्द्रनाथ 1960 Criminal L.J. 338 में माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार :  किसी प्रकरण में किसी व्यक्ति को येन-केन प्रकारेण दोषसिध्द करने का प्रयास करना अन्वेषण का न तो कभी उद्देश्य रहा है और न ही हो सकता है। अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह मामले की तह में जाकर यह पता लगाये कि वस्तुतः उसने कोई अपराध कारित किया है या नही। न्याय के लिए यह परम आवश्यक है।

सुरेन्द्र सिह बनाम स्टेट आफ बिहार (2002) 1 S.C.C. 266: 2002 S.C.C. (Criminal) 165 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : ऐसे मामलों में अभियुक्त की शिनाख्त हेतु कार्यवाही का संचालन नही किया जा सकता है, जहां प्रथम सूचना रिपोर्ट में ही अभियुक्त को पहचान पाने में असमर्थता अभिव्यक्त कर दी गयी हो।

आत्मा सिंह बनाम स्टेट आफ राजस्थान 1979 (Criminal) LR 542 Rajsthan में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : तलाशी तथा जब्ती दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के समक्ष ली जानी चाहिए, किसी महिला की तलाशी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ली जानी चाहिए तथा यथासम्भव सूर्यास्त से सूर्योदय के मध्य तलाशी नही जानी चाहिए।

जोगिन्दर कुमार बनाम स्टेट, (1994) 4 S.C.C. 260: 1994 S.C.C. (Criminal) 1172 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : किसी अभियुक्त की गिरफ्तारी से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि गिरफ्तारी के पर्याप्त आधार विद्यमान हैं या नहीं।

चेरिपल्ली शंकर राव बनाम पब्लिक प्रासीक्यूटर आन्ध्र प्रदेश, उच्च न्यायलय हैदराबाद, 1995 Supp (4) S.C.C. 24: 1996 S.C.C. (Criminal) 21 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : मृत्युकालिक कथन यथासम्भव मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए, परन्तु अपरिहार्य परिस्थितियों में पुलिस अधिकारी द्वारा भी लेखबध्द किये जा सकते हैं।

जाहिरा हबीबुल्लाह शेख बनाम स्टेट आफ गुजरात, (2004) 4 S.C.C. 158: 2004 S.C.C. (Criminal) 999  में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : साक्षियों को धमकी, उत्पीड़न व दबाव आदि के विरूध्द संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।

दुखमोचन पाण्डेय बनाम स्टेट आफ बिहार,(1971) 8 S.C.C. 405: AIR 1998 SC 40 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह घटना की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों (साक्षियों) के कथन  अविलम्ब लेखबध्द करें।

स्टेट आफ महाराष्ट्र बनाम भरत फकीरा धीवार (2002) 1 S.C.C. 622: 2002 S.C.C. (Criminal) 217 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : किसी घटना का साक्षी होने का कोई विशेष नियम नही है। कोई बालक भी जिसे घटना के बारे में जानकारी है साक्षी हो सकता है।

भागीरथी चौधरी बनाम एम्परर, AIR 1926 Cal 55 में माननीय न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : मानचित्र (नक्शा नजरी) में घटनास्थल की वास्तविक स्थिति को अंकित किया जाता है। यह एक मूल्यवान साक्ष्य है।

रमेश कुमारी बनाम स्टेट (एन0 सी0 टी0 दिल्ली), (2006) 2 S.C.C. 677 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : पुलिस अधिकारी प्रथम सूचना रिपोर्ट को लेखबध्द करने के लिए आबध्द हैं जिससे कोई संज्ञेय अपराध घटित होना प्रकट होता हो।

शिबिया बनाम स्टेट आफ राजस्थान, 1979 (Criminal) LR 667 SC में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार :  बलात्कार के मामलों में अभियुक्त एवं अभियोक्त्री (पीड़िता) दोनों का चिकित्सीय परीक्षण कराया जाना आवश्यक है।

बलविन्दर कौर बनाम बाबा सिंह AIR 2002 P and H 378 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : जहां किसी बिन्दु पर दो हस्तलेख विशेषज्ञों की राय में विरोधाभाष हो, वहां पर ऐसे विशेषज्ञ की राय महत्व रखती है जो युक्तियुक्त कारणों पर आधारित हो।

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