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अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग- 03)

अन्वेषण से सम्बन्धित माननीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय (भाग- 03)

अन्वेषण के सम्बन्ध में समय-समय पर भारत के  माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों बहुत से अति महत्वपूर्ण निर्णय /मत / नजीर दी गयी हैं। ये महत्वपूर्ण निर्णय /मत / नजीरें निम्नलिखित है :-

रघुनाथ शर्मा बनाम् स्टेट (1963) 2 Criminal L.J. 42; प्रासीक्यूटिंग इन्सपेक्टर बनाम् एम. महतो, 1952 Criminal L.J. 1635 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का उद्देश्य मात्र यह नही होता है कि वह येन-केन प्रकारेण ऐसा मामला बनाकर न्यायालय के समक्ष पेश कर दे जिससे नायायालय द्वारा अभियुक्त को दोषसिध्द घोषित किया जा सके। किसी अपराध के घटित होने की सूचना मिलने पर अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह सत्य का पता लगाने का प्रयास करे।

स्टेट आफ उत्तर प्रदेश बनाम हरिमोहन, (2000) 8 S.C.C. 598: AIR 2001 SC 142 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण का सही, पूर्ण एवं त्रुटिपूर्ण होना परम आवश्यक है परन्तु यदि अन्वेषण में कोई त्रुटि रह जाती है तो तो मात्र त्रुटि के कारण अभियुक्त दोषमुक्ति के हकदार नही हो जाते हैं, विशेष तौर पर तब जब सभी या उनमें से कुछ अभियुक्तगणों के विरूध्द मामला स्पष्ट रूप से बनना पाया जाता हो।

स्टेट आफ वेस्ट बंगाल बनाम मीर मोहम्मद(2000) 8 S.C.C. 382; 2000 S.C.C. (Criminal) 1516 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण अधिकारी का कार्य अत्यन्त दुरूह है। अन्वेषण अधिकारी को सीमित साधनों में अपराध से अपराधी तक पहुंचना होता है। ऐसी स्थिति में अन्वेषण में कुछ कमियां अथवा अनियमितताएं रह जाना स्वाभाविक है। इसलिए ऐसी छोटी-मोटी कमियों अथवा अनियमितताओं के कारण अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी पर टिप्पणी नही की जानी चाहिए।

आर. एस. सोधी बनाम् स्टेट आफ उत्तर प्रदेश, 1994 Supp (1) S.C.C. 143: AIR 1994 SC 38  में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण के मामलों में पुलिस अधिकारियों को अपनी साख तथा विश्वसनीयता बनाये रखनी चाहिए। यदि विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है तो मामले का अन्वेषण सी0 बी0 आई0 या अन्य किसी एजेन्सी को सौंपा जा सकता है।

स्टेट आफ आन्ध्र प्रदेश बनाम पी. रामूलू 1994 Supp (1) S.C.C. 590: 1994 S.C.C. (Criminal) 734 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : यदि मामला किसी अन्य पुलिस थाने की अधिकारिता का है तो प्रथम सूचना रिपोर्ट देने वाले व्यक्ति (परिवादी) को इसी कारण वहां से वापस नही किया जायेगा, बल्कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर उसे समुचित पुलिस थाने में प्रेषित करना चाहिए।

स्टेट आफ राजस्थान बनाम एन. के. (2000) 5 S.C.C. 30: 2000 S.C.C. (Criminal) 898 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : यदि बलात्कार जैसे मामले में ग्राम पंचायत के हस्तक्षेप, इज्जत तथा सामाजिक प्रतिष्ठा के भय के कारण प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाने में विलम्ब किया जाता है तो इसमें न तो अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी का दोष माना जायेगा और न ही पीड़ित पक्ष का दोष माना जायेगा।

रामकुमार बनाम् स्टेट आफ हरियाणा 1995 Supp (1) S.C.C. 248: AIR 1995 SC 280 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : अन्वेषण अधिकारी को प्रथम सूचना रिपोर्ट लेखबध्द करनें में अनावश्यक विलम्ब नही करना चाहिए।

सचिव पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय  बार एशोसिएशन बनाम् स्टेट आफ पंजाब एवं हरियाणा,(1994) 1 S.C.C. 616: 1994 S.C.C. (Criminal) 455 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : सामान्यतया सर्वोच्च न्यायालय भी अन्वेषण में हस्तक्षेप नही करता है।

भगवान सिंह बनाम् स्टेट आफ राजस्थान, (1976) 1 S.C.C. 15: 1975 S.C.C. (Criminal) 737 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार :  किसी पुलिस अधिकारी को किसी ऐसे मामले का अन्वेषण नहीं करना चाहिए जिसमें वह स्वयं परिवादी हो।

बाल कृष्ण स्वामी बनाम् स्टेट आफ उड़ीसा, 1972 S.C.C. (Criminal) 28  में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार : विलम्ब को कारण अच्छा से अच्छा साक्ष्य तथा आधार भी नष्ट हो सकता है। इसलिए अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी को सदैव चुस्त और उद्यमी होना चाहिए।

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