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कारागार (JAIL)

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कारागार क्या है ?

कारागार का अत्यन्त प्राचीन इतिहास है। प्राचीन काल में कारागार प्रतिवादी को रोंके रखने का स्थान माना जाता था। मध्यकाल तथा ब्रिटिश काल में अपराधियों को कष्ट पहुंचाने के लिए कारागार का प्रयोग किया गया। वर्ष 1919 में जेल सुधार समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कारागार की दशा में सुधार किया गया तथा कारागार का प्रयोग सुधारात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाने लगा। वर्तमान समय में देश के प्रत्येक राज्य के प्रत्येक जनपद में न्यायालय द्वारा विचाराधीन बन्दियों तथा सजायाफ्ता बन्दियों को कारागार में रखा जाता है।

कारागार एक ऐसी जगह होती है जहां पर चोरी, लूट, डकैती आदि अपराध कारित करने वाले अपराधियों को रखा जाता है। उत्तर प्रदेश में एक आदर्श कारागार (जनपद लखनऊ), 05 केन्द्रीय कारागार, 60 जिला कारागार, 02 उप कारागार, 01 किशोर सदन, 01 नारी निकेतन हैं। केन्द्रीय कारागार नैनी को छोड़कर शेष कर सिद्धदोष तथा विचाराधीन बन्दियों को रखा जाता है।

कारागार के अन्य नाम जेल, कारागृह, कैदखाना तथा कारागृह हैं।

कारागार में प्रवेश के लिए वर्जित वस्तुएः

कारागार अधिनियम 1894 का धारा 59 की उपधारा 13 के अनुसार राज्य सरकार को कतिपय वस्तुओं का जेल में प्रवेश निषिध्द करने का अधिकार है जिसके द्रारा ड्रग, नारकोटिक, नशीली वस्तुएं, विस्फोटक पदार्थ, अस्त्र-शस्त्र, वायरलेस  सेट, सेलफोन, धातु, ज्वेलरी, फर्मेन्टेड शराब, चिलम, पाइप, विस्फोटक, जहरीली चीजें, आद बुझाने वाले तत्व, रस्सी, लैडर, स्टिक्स आदि वस्तुएं कारागार में प्रवेश के लिए वर्जित हैं।

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कारागार में पुस्तकालय की व्यवस्थाः

प्रत्येक कारागार में एक पुस्तकालय की व्यवस्था है जिसमें बन्दियों के उपयोगार्थ पुस्तकें, साहित्य, पवित्र धार्मिक ग्रन्थ आदि की व्यवस्था उपलब्ध है।

कारागार में शिक्षा की व्यवस्थाः

सभी कारागारों में निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने के लिए “नया सवेरा” कार्यक्रम संचालित किया गया है

अपराधी को कारागार में रखने का क्या उद्देश्य है ?

अपराधी को कारागार में रखने के निम्नलिखित उद्देश्य हैंः

(1) अपराधियों से समाज की सुरक्षा करना।

(2) अपराध का प्रतिरोध करना।

(3) अपराधी का सुधार करना।

(4) समाज से अपराधी को अलग रखना।

(5) अपराधी को अपने आपराधिक कार्य का पश्चाताप का अवसर दिया जाना।

(6) अपराध पर नियन्त्रण किया जाना।

भारतवर्ष में कारागार की प्रकारः

(1) केन्द्रीय कारागार।

(2) जिला कारागार।

(3) खुला कारागार।

(4) विशेष कारागार।

(5) आदर्श कारागार

केन्द्रीय कारागारः

प्रत्येक राज्य में केन्द्रीय कारागार की संख्या 1 से 6 तक हो सकती है। इन कारागारों का उपयोग सुधारगृह के रूप में किया जाता है । इन कारागारों में लम्बी अवधि तक कारावास का दण्ड पाए हुए अपराधियों को रखा जाता है।

जिला कारागारः

न्यायालय द्वारा सजायाफ्ता तथा विचाराधीन बन्दी रखे जाते हैं जिनकी श्रेणीवार संख्या निर्धारित रहती है। जिला कारागार में जो भी बन्दी दाखिल होता है उसका डॉक्टरी परीक्षण जेल में नियुक्त चिकित्सक द्वारा किया रहती है। इसके अतिरिक्त सिविल बन्दी, महिला बन्दी, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में निरुद्ध व्यक्ति भी जिला कारागार में रखे जाते हैं। जिला कारागार में जो भी बन्दी दाखिल होते हैं उसका डॉक्टरी परीक्षण जिला कारागार में नियुक्त चिकित्सक द्वारा किया जाता है।

खुली कारागारः 

भारत के कुछ राज्यों में खुले कारागार स्थापित हैं। उत्तराखण्ड में 01, महाराष्ट्र में 03, राजस्थान में 06, तमिलनाडु में 02, हिमाचल प्रदेश में 01, केरल में 01, पंजाब में 02, बिहार में 02, असम में 01,  गुजरात में 02 तथा आन्ध्र प्रदेश में 02 खुला कारागार हैं।

खुली कारागार का विशेषताएंः

(1)  इनमें  दीवार, सलाखें तथा ताले नहीं होते हैं।

(2)  कारागार का  कार्य बन्दियों द्वारा किया जाता है।

(3)  बन्दी बिना किसी रक्षक के बाजार जा सकते हैं।

विशेष कारागारः

भारतवर्ष में बाल अपराधियों, महिला अपराधियों तथा राजनीतिक अपराधियों के लिए विशेष कारागार की व्यवस्था की गई है।

आदर्श जेलः 

प्रत्येक राज्य अपने किसी भी जनपद में आदर्श जेल की स्थापना कर सकते हैं। आदर्श जेल में उन अपराधियों को रखा जाता है जो 7 वर्ष से अधिक का दण्ड पाए हों तथा कम से कम छह माह सेन्ट्रल जेल में रह चुके हों और उनका आचरण बहुत अच्छा रहा हो। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आदर्श जेल स्थापित है।

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