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अपराध के लिए दण्ड

अपराध के लिए दण्ड

 

जब कोई व्यक्ति किसी कार्य या कार्य का लोप कर के तत्समय प्रवृत्त किसी विधि का उल्लंघन करता है तो उसके लिए उसे तत्समय प्रवृत्त विधिनुसार दण्ड दिया जाता है। दण्ड राज्य / केन्द्र सरकार द्वारा दिया जाता है। दण्ड की गम्भीरता के आधार पर अलग अलग अपराधों के लिए अलग-अलग दण्ड निर्धारित किये गए हैं।

दण्ड के सिद्धान्त (Penal principle)

(A) दण्ड का प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त (Vindictive principle)

यह सिद्धांत बदले की भावना पर आधारित है। जैसे- यदि किसी ने किसी का हाथ काट लिया तो हाथ काटने वाले दोषी व्यक्ति का हाथ काट लिए जाने का दन्ड दिया जाना चाहिए। यदि किसी ने किसी व्यक्ति की आंख निकाल ली है तो उस अपराधी व्यक्ति की आंख निकाल लिए जाने का दण्ड दिया जाना चाहिए।

यह दण्ड सिद्धान्त मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल मे प्रचलित था। जिसकी इस आधार पर आलोचना की गई कि यह दन्ड सिद्धान्त बदला लेने की क्रूर भावना पर आधारित है जिससे समाज में शत्रुता बढ़ जाएगी।

(B) दण्ड का प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त (Deterrence theory)

प्रतिरोधात्मक दण्ड सिध्दान्त के अनुसार अपराधी को दण्ड देने का उद्देश्य उसको पुनः अपराध करने से रोंकना है।

इसमें कारावास का दन्ड दिया जाता है। गम्भीर अपराधों हत्या आदि में मृत्युदण्ड तक दिया जा सकता है। इतना कठोर दण्ड इसलिए दिया जाता है कि उन अपराधी व्यक्तियो के मन में भय पैदा हो सके जो कि हत्या करने की भावना से या आर्थिक लाभ के लिए हत्याएं करते हैं।

दण्ड के प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त की आलोचना इस आधार पर हुई कि मृत्युदण्ड देने के बाद भी हत्यायें हो रही है, अपराध में अपराधियों के साथ-साथ परिस्थितियां भी अपराध के लिए उत्तरदायी होती हैं।

(C) दन्ड का सुधारात्मक सिद्धान्त (Corrective principal of punishment)

वर्तमान समय में यह सिद्धान्त सर्वाधिक स्वीकार्य सिद्धान्त है।  सुधारात्मक दण्ड सिध्दान्त का मुख्य उद्देश्य अपराधी का सुधार करना एवं उसे पुनः समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है ताकि अपराधी दुबारा अपराध करने का साहस न कर सके। दण्ड का यह सिद्धान्त अपराध की अपेक्षा अपराधी को अधिक महत्व देता है।

दण्ड के इस सिध्दान्त के अनुसार दण्ड दिये जाने परप अपराधी पर प्रतिकूल प्रभाद पड़ता है तथा वह पुनः अपराध कारित करने की तरफ अग्रसर हो सकता है तथा अपराध कारित करके समाज की क्षति कर सकता है। दण्ड अपराधी व्यक्ति को स्वयं अपनी तथा समाज की नजर में दोषी बना देता है जिसके कारण वह समाज से अलग-थलग होकर अपराधियों के सम्पर्क में आ जाता है तथा अपराध की पुनरावृत्ति कर बैठता है।

कुछ अपराध शास्त्रियो ने इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि अपराधी के सुधार का कार्य किस मूल्य पर किया जाए तथा ये भी निस्चित नही है कि वह अपराधी सुधर जाएगा और पुनः अपराध नही करेगा।

भारत मे प्रचलित दण्ड व्यवस्था (Penal system prevalent in India)

भारत में दण्ड की सुधारात्मक एव प्रतिरोधात्मक दण्ड प्रणाली प्रचलित है। इस दण्ड व्यवस्था को आदर्श दण्ड व्यस्था भी कहा जाता है।

गम्भीर अपराधों जैसे- हत्या, हत्या सहित डकैती,भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करना आदि गम्भीर अपराधों में आजीवन कारावास एवं मृत्युदण्ड दिए जाने का प्राविधान है।

अर्थदण्ड दिए जाने एवं अर्थदण्ड न भोगने पर उसके स्थान पर कारावास का दण्ड दिए जाने का भी प्राविधान है। अपराधों में अपराधियों को परिवीक्षा पर छोड़े जाने का भी  प्राविधान है। जेल में लम्बी अवधि से कारावास का दण्ड भोग रहे अपराधियों को पैरोल पर छोड़े जाने का प्राविधान हैं । मृत्युदण्ड पाए हुए अपराधी को क्षमा प्रदान करने का अधिकार राष्ट्रपति को हैं। दण्ड पाए हुये अपराधी को उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।

भारत मे अपीलीय न्यायालय (Appellate Court in India)

भारत के सभी उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय अपीलीय न्यायालय हैं।उच्च न्यायालय में सम्बन्धित राज्य के लोग तथा उच्चतम न्यायालय में सम्पूर्ण भारत के लोग अपील कर सकते है।

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