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अन्वेषण में लिखित साक्ष्य एकत्र करने के स्रोत

अन्वेषण में लिखित साक्ष्य एकत्र करने के स्रोत

विवेचना के दौरान विवेचक द्वारा अभिलेखीय साक्ष्य के रूप में कब्जे मे लिये जाने वाले अभिलेखों को लिखित साक्ष्य कहा जाता है। लिखित साक्ष्य एकत्र करने के मुख्य स्रोत निम्नवत हैं:-

1. अपराध से सम्बन्धित वे सभी अभिलेख जिनका परीक्षण विधि विज्ञान प्रयोगशाला से कराया जाना हो, एकत्र करना-

सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध जैसे- फर्जी कूटरचित बैनामा / वसीयतनामा, अमानत में खयानत, सरकारी धन गमन आदि ( धारा- 419, 420, 467, 468, 469, 471, 406, 407, 408, 409 भा0दं0वि0 आदि) के अपराध की विवेचना के दौरान विवेचक द्वारा अपराध से सम्बन्धित दस्तावेजी अभिलेख जैसे- बैनामा दस्तावेज, वसीयतनामा दस्तवेज, कैश बुक, चेक आदि कब्जे में लेकर विवेचना में सम्मिलित करते हुए उनमें अंकित प्रविष्टियों, विवादित हस्तलेखों तथा हस्ताक्षर, निशानी अंगूठा इत्यादि का मिलान अभियुक्त के हस्तलेख, हस्ताक्षर या निशानी अंगूठा का मिलान एक्सपर्ट से कराये जाने पर मिलान होने पर अभियुक्त के विरूध्द अकाट्य साक्ष्य मिल जाता है जो कि लिखित साक्ष्य है।

2. अभियुक्त की कार्यवाही शिनाख्त रिपोर्ट से प्राप्त साक्ष्य-

किसी अपराध में अभियुक्तों का नाम पता अज्ञात होने पर गिरफ्तारी करके नियमानुसार कार्यवाही शिनाख्त कराये जाने पर कार्यवाही शिनाख्त रिपोर्ट के अनुसार यदि गवाहों द्वारा सही पहचान की गयी है तो उक्त कार्यवाही रिपोर्ट अभियुक्त के विरूध्द लिखित साक्ष्य होती है।

3. घटना के उद्देश्य का अभिलेखीय साक्ष्य

शरीर सम्बन्धी अपराधों में वादी मुकदमा व अभियुक्तगणों के मध्य पूर्व में हुए झगड़ों / विवादों की सूचनाएं विवेचक को एकत्र करनी चाहिए। ये घटना के उद्देश्य की लिखित साक्ष्य होती हैं।

4. चोटों की परीक्षण रिपोर्ट

शरीर सम्बन्धी अपराधों में विवेचक द्वारा एकत्र की गयी चिकित्सीय परीक्षण रिपोर्ट लिखित साक्ष्य के रूप में न्यायालय में मान्य हैं।

5. पोस्टमार्टम रिपोर्ट

शरीर सम्बन्धी अपराधों में विवेचक द्वारा एकत्र की गयी मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट जिससे मृतक का मृत्यु के कारण, मृत्यु के संभावित समय, चोटों के प्रकार, चोटें मृत्यु के पूर्व की हैं या बाद की हैं इत्यादि का साक्ष्य मिलता है, लिखित साक्ष्य है जो कि न्यायालय में ग्राह्य है।

6. अपराध से सम्बन्धित वस्तुएं बरामद कर एकत्र किया गया साक्ष्यः

किसी अपराध से सम्बन्धित कोई वस्तु बरामद किये जाने पर उसके सम्बन्ध में बनायी गई फर्द बरामदगी लिखित साक्ष्य है।

7. घायल व्यक्ति के मृत्युकालिक कथन का साक्ष्यः

किसी घायल मरणासन्न व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण के सम्बन्ध में या उस संव्यवहार की किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई है, किया गया लिखित या मौखिक कथन मृत्युकालिक कथन कहलाता है।  धारा- 32(1) भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार मृत्युकालिक कथन न्यायालय में सुसंगत साक्ष्य के रूप में मान्य हैं। हत्या के अपराध में विवेचक मृत्युकालिक कथन चाहे वह लिखित रूप में हो या मौखिक रूप में हो, को साक्ष्य के रूप में आधार बनाकर निष्कर्ष / परिणाम निकालने का निर्णय ले सकता है। मृत्युकालिक कथन एक ऐसा साक्ष्य है जिसे न्यायालय द्वारा शपथ और जिरह के नियम को तोड़ते हुए विश्वास किया जाता है। मृत्युकालिक कथन के सम्बन्ध में न्यायालय की यह अवधारणा है कि जब मरणासन्न व्यक्ति मर रहा होता है तो वह अन्तरात्मा से सत्य बोलता है। मृत्युकालिक कथन पर न्यायालय द्वारा न तो शपथ ली जाती है और न ही अभियुक्त को जिरह का अवसर दिया जाता है। मृत्युकालिक कथन अंकित किये जाने के बाद यदि मरणासन्न व्यक्ति बच जाता है यानी उसकी मृत्यु नही होती है तो उक्त कथन मृत्युकालिक कथन नही माना जाता है।

8. न्यायालय द्वारा दी पूर्व में दी गई सजाएं-

यदि किसी अपराध में किसी अभियुक्त को किसी न्यायालय द्वारा पूर्व में कोई सजा दी गई है तो विवेचक उक्त सजाओं से सम्बन्धित न्यायालय के दण्डादेश की प्रमाणित प्रतियां न्यायालय के अभिलेखागार से नियमानुसार प्राप्त करके विवेचना में सम्मिलित करते हुए केश डायरी व आरोप पत्र में अंकित किया जाता है जो लिखित साक्ष्य के रूप में न्यायालय में ग्राह्य है तथा अभियुक्त को अधिकाधिक दण्ड दिलाने में भी सहायक है।

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