शिक्षाशास्त्र (PEDAGOGY)

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शिक्षाशास्त्र (Pedagogy) क्या है ?

शिक्षण कार्य की प्रक्रिया के भलीभांति अध्ययन को शिक्षाशास्त्र (Pedagogy) या शिक्षण शास्त्र कहते हैं । इसके अन्तर्गत अध्यापन की शैली अथवा नीतियों का भली-भांति अध्ययन किया जाता है । अध्यापक जब कक्षा में अध्यापन कार्य करता है तो उसे इस बात का पूर्णतया ध्यान रखना चाहिए कि वह इस प्रकार पढ़ाए की अधिगमकर्ता (शिक्षार्थी) को अधिक से अधिक समझ में आ जाए ताकि वह उसका अधिक से अधिक सदुपयोग कर सके ।

शिक्षा एक सजीव तथा गतिशील प्रक्रिया है जिसमें अध्यापक तथा विद्यार्थी के मध्य एक अन्तः क्रिया होती रहती है जो किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है । वर्तमान समय में बदलते समय के साथ सम्पूर्ण शिक्षाचक्र गतिशील है । इसकी गति किस दिशा में हो रही है ? कौन प्रभावित हो रहा है ? उपरोक्त समस्त दशाओं का लक्ष्य निर्धारण शिक्षाशास्त्र करता है ।

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शिक्षाशास्त्र के जनक कौन हैं ?

जान फेडरिक हरबर्ट

शिक्षण के क्या-क्या सिद्धान्त हैं ?

प्रत्येक अध्यापक की यह हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो तथा वह किन- किन बातों को ध्यान में रखकर एवं किस प्रकार से पाठ्यक्रम पढ़ाए कि छात्र उसमें अधिक से अधिक रुचि लें और अर्जित ज्ञान-विज्ञान बालकों के लिए उपयोगी बनाया जा सके । शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त निम्नवत है-

(1) क्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्त ।

(2) जीवन से सम्बद्धता का सिद्धान्त ।

(3) हेतु प्रयोजन का सिद्धान्त ।

(4) चुनाव का सिद्धान्त ।

(5) विभाजन का सिद्धान्त ।

(6) पुनरावृति का सिद्धान्त ।

(1) क्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्तः

बालक स्वभाव से ही क्रियाशील होते हैं जिसके कारण उन्हें अपने हाथ, पैर व अन्य इन्द्रियों को प्रयोग में लाने में अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है । बालक स्वयं करने की क्रिया द्वारा अधिक सीखता है । इस प्रकार प्राप्त ज्ञान या अनुभव बालक के व्यक्तित्व का स्थाई अंग बनकर रह जाता है । अतः अध्यापक का अध्यापन इस प्रकार होना चाहिए कि बालकों को स्वयं करने द्वारा सीखने का अधिकाधिक अवसर मिल सके ।

(2) जीवन से सम्बद्धता का सिद्धान्तः

इस सिद्धान्त के अनुसार पाठ्यक्रम में जीवन से सम्बन्धित तथ्यों को ही शामिल करना चाहिए । यदि अध्यापक काल्पनिक या जीवन से असम्बन्धित तथ्यों को ही पढ़ाना चाहेगा  तो उससे छात्रों की रूचि हट जायेगी ।

(3) हेतु प्रयोजन का सिद्धान्तः

इस सिद्धान्त के अनुसार पाठ का उद्देश्य बालकों की रुचि को प्रेरणा देने वाला होना चाहिए ताकि उनका पूरा ध्यान उस पाठ को सीखने में लग सके ।

(4) चुनाव का सिद्धान्तः

इस सिध्दान्त के अनुसार अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय पाठ्य सामग्री से अत्यन्त उपयोगी वस्तुओं को ही चुन कर पढ़ाना चाहिए ।

(5) विभाजन का सिद्धान्तः

इस सिद्धात के अनुसार अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय सम्पूर्ण पाठ्यक्रम एकमुश्त बालकों के समक्ष नहीं रखना चाहिए, उसे विभिन्न इकाइयों या खण्डों में बांट कर रखना चाहिए ।

(6) पुनरावृति का सिद्धान्तः

इस सिध्दान्त के अनुसार बालक किसी विषयवस्तु या पाठ्यक्रम को अपने मस्तिष्क में ठीक तरह से तभी जमा कर सकता है जब उसे बार-बार उसकी आवृत्ति करायी जाये अर्थात् रिवीजन कराया जाये । इसलिए अध्यापक को किसी विषयवस्तु को कक्षा में बार-बार आवृत्ति कराया जाना चाहिए ताकि बालक को अच्छी तरह याद  हो सके ।

शिक्षण-सूत्रः

(1)ज्ञात से अज्ञात की ओर चलोः

बालक को पूर्व ज्ञान से हट कर जब नया ज्ञान प्रदान किया जाता है तो वह उसे सीखने में काफी रूचि लेता है । इसलिए अध्यापक को पाठ्य सामग्री इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि बालक को लगातार नया ज्ञान मिलता रहे ताकि बालक उसे सीखने यानी पढ़ने व समझनें में पर्याप्त रूचि ले ।

(2) स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलोः

अध्यापक को बालक को सूक्ष्म एवं अमूर्त विचारों को को सिखाते समय उनका प्ररम्भ आस-पास की स्थूल वस्तुओं और स्थूल विचारों से करना चाहिए । ताकि बालक विषयवस्तु को अच्छी तरह समझ सके ।

(3) सरल से कठिन की ओर चलोः

अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय पाठ्यवस्तु के सरल भागों को पहले प्रस्तुत करते हुए धीर-धीरे कठिन भागों को प्रस्तुत करना चाहिए ।

(4 )अनुभव से तर्क की ओर चलोः

बालक अपनी ज्ञानेन्द्रयों के माध्यम से यह तो जान लेता है कि अमुक वस्तु कैसी है ? परन्तु यह नही जान पाता कि अमुक वस्तु ऐसी क्यों है ? बालक बार-बार निरीक्षण तथा परीक्षण से ही यह जान पाता है कि अमुक वस्तु ऐसी क्यों है,यानी अनुभव से तर्क की ओर बढ़ता है । इसलिए अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय बालक के अनुभूत तथ्यों को आधार बनाकर धीरे-धीरे निरीक्षण एवं परीक्षण के माध्यम से बालक की तर्कशक्ति के विकास का प्रयास किया जाना चाहिए ।

(5) पूर्ण से अंश की ओर चलोः

अध्यापक को अध्यापन करते समय बालक के समक्ष पहले सम्पूर्ण वस्तु या तथ्य को रखना चाहिए तदोपरान्त उसके विभिन्न अंशों का विस्तृत ज्ञान प्रदान करना चाहिए । यदि किसी वृक्ष को बारे में सम्पूर्ण ज्ञान प्रदान करने है तो पहले उसका सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करना चाहिए, तत्पश्चात उसके विभिन्न अंगो जड़, तना, पत्ती, फूल, फल आदि का पृथक-पृथक परिचय कराना चाहिए । ऐसा करने से बालक सम्पूर्ण वस्तु या तथ्य को आसानी से समझ लेता है ।

(6) विशेष से सामान्य की ओर चलोः

अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय किसी विषय वस्तु की विशेष बातों को बालक के समक्ष पहले प्रस्तुत करना चाहिए तथा सामान्य बातों को बाद में धीरे-धीरे प्रस्तुत करना चाहिए ।

(7) अनिश्चित से निश्चित की ओर चलोः

बालक अपना संवेदनाओं के माध्यम से अनेक अस्पष्ट एवं अनियमित वस्तुओं की जानकारी करता है जिसे अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय भलीभांति स्पष्ट करना चाहिए ।

(8) विश्लेषण से संश्लेषण की ओरः

अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय बालक (छात्र) को पूर्ण ज्ञान प्रदान किया जाय । इसके बाद उक्त पूर्ण ज्ञान के विभिन्न अंशों का विश्लेषण किया जाय तथा इसके बाद पुनः उसे पूर्णता की तरफ और संश्लेषित किया जाय ।

(9) तर्कपूर्ण विधि का त्याग कर मनोवैज्ञानिक विधि का अनुसरण किया जायः

अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय शिक्षण विधि तथा क्रम में बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, रूचियों, जिज्ञासा तथा ग्रहण शक्ति को ध्यान में रखा जाय ।

(10) अध्यापक को अध्यापन कार्य करते समय बालक (छात्र) को इन्द्रियों के प्रशिक्षण के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करना चाहिए । ताकि बालक असानी से शिक्षा को ग्रहण कर सके ।

(11) अध्यापक के द्वारा बालक को इस प्रकार शिक्षा देनी चाहिए कि शिक्षा बालक के विकास में बाधा न होकर सहायक हो सके । ताकि बालक का विकास प्रभावित न हो ।

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