लैमार्कवाद तथा डार्विनवाद – (LAMARCKISM AND DARWINISM)

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लैमार्कवाद(Lamarckism)

फ्रान्सीसी वैज्ञानिक जे0बी0डी0 लैमार्क ने वर्ष 1809 ई0 में प्रकाशित अपनी प्रसिध्द पुस्तक, “फिलासफी जूलोफिक” में विकास के 03 सिध्दान्तों को प्रतिपादित किया है जिसे लैमार्कवाद कहा जाता है । लैमार्कवाद वातावरण के परिवर्तन के कारण जीव की उत्पत्ति, अंगों का व्यवहार या अव्यवहार, जीवनकाल में अर्जित गुणों का जीवों द्वारा अपना संतति में पारेषण लैमार्कवाद है ।

लैमार्कवाद के द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्त निम्नलिखित हैं –

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(1)वातावरण का प्रभावः

लैमार्क द्वारा प्रतिपादित इस सिध्दान्त के अनुसार प्रत्येक जीव की संरचना तथा स्वभाव पर वातावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पडता है जिससे उसकी संरचना व स्वभाव में परिवर्तन होता है तथा यह परिवर्तित गुण/स्वभाव/लक्षण उसकी अगली पीढी की संतान में स्थानान्तरित हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप नयी प्रजाति का जन्म होता है । जैसे- जिराफ की गर्दन का लम्बा होना ।

(2)अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग का सिध्दान्तः

अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग के इस सिध्दान्त के अनुसार वातावरण के प्रभाव से कुछ अंग अधिक उपयोग में आते हैं जिसके कारण उस अंग का अधिक विकास हो जाता है तथा जो अंग उपयोग में नही आते उनका विकास नही हो पाता और वे धीरे-धीरे ह्रासित होते जाते हैंतथा अवशेषी अंग के रूप में रह जाते हैं ।

(3)उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिध्दान्तः

लैमार्क के इस सिध्दान्त के अनुसार वातावरण के प्रभाव में अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग प्राणी से शरीर में विविध परिवर्तन या लक्षण विकसित हो जाते हैं जो कि वंशानुगति होने के कारण संतान तक पहुंच जाते हैं तथा कुछ पीढियों के बाद अपने पूर्वज से पूर्णतया अलग नयी प्रजाति के रूप में विकसित हो जाते हैं ।

डार्विनवाद (Darwinism)

ब्रिटेन के प्रसिध्द वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने वर्ष 1859 ई0 में प्रकाशित अपनी पुस्तक, “वरण द्वारा नई प्रजातियों का उदभव”  में प्राकृतिक वरण से सम्बन्धित कुल 04 सिध्दान्तों का प्रतिपादन किया है जो कि निम्नवत हैंः

(1)प्राणियों में प्रचुर सन्तानोत्पत्तिः

चार्लस डार्विन के इस सिध्दान्त के अनुसार प्रत्येक जीव (जन्तु तथा वनस्पति) में अपनी जाति के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सन्तानोत्पत्ति का पर्याप्त क्षमता होती है  परन्तु सभी सन्तानें जीवित नही रह पातीं। जैसे- सीपी तथा एस्केरिस एक बार में क्रमशः लगभग 6,00,00,000 व 2,70,00,000 अण्डे देती हैं। यदि ये सभी जीवित रहें तो पृथ्वी पर कोई जगह खाली नही रहेगी । इनमें से काफी अण्डे नष्ट हो जाते हैं, बहुत कम ही जिन्दा रहते हैं । पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में सबसे कम बच्चे हाथी पैदा करती है जो कि अपने पूरे जीवनकाल में औसतन छः बच्चे ही पैदा करती है।

(2)योग्यतम का उत्तरजीविता का सिध्दान्तः

इस सिध्दान्त के अनुसार जीवन संघर्ष में केवल वे ही जीव सफल होते हैं जो पूरी तरह वातावरण से अनुकूलन स्थापित कर लेते हैं । जो जीव अनुकूलन स्थापित नही कर पाते वे समाप्त हो जाते हैं । इस प्रकार प्राकृतिक संघर्ष में वातावरण के अनुकूल प्रणियों के जीवित रहने तथा वातावरण के प्रतिकूल प्राणियों के नष्ट हो जाने को प्राकृतिक वरण कहा जाता है ।

(3)नयी जाति की उत्पत्तिः

चार्ल्स डार्विन के अनुसार योग्यतम जीव में आया विशेष लक्षण पीढी दर पीढी स्थानान्तरित होता रहता है तथा कुछ समय के बाद नयी जाति उत्पन्न होती है ।

(4)जीवन संघर्षः

अधिक सन्तानोत्पत्ति के पश्चात प्राणियों में  स्थान एवं भोजन के लिए संघर्ष होता है। यह संघर्ष भ्रूणावस्था से लेकर आजीवन चलता रहता है। ये संघर्ष तीन प्रकार का होता है – अन्तराजातीय(Intra Specific), अन्तर्जातीय(Inter Specific) तथा वातावरण(Environment)।

अन्तराजातीय(Intra Specific) के अन्तर्गत जीवन का संघर्ष एक ही जाति के प्राणियों के मध्य होता है।

अन्तर्जातीय(Inter Specific) के अन्तर्गत जीवन का संघर्ष विभिन्न जाति के प्राणियों के मध्य होता है।

वातावरण(Environment) के अनुसार-जीवन संघर्ष वातावरण में अधिक ठण्ड, गर्मी, वर्षा, बाढ, अकाल, विभिन्न रोग, ज्वालामुखी आदि में होता है।

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