Home NEET उत्परिवर्तन एवं सुजनिकी- (MUTATION AND EUGENICS)

उत्परिवर्तन एवं सुजनिकी- (MUTATION AND EUGENICS)

47
0

किसी जीव के लक्षणों में अचानक आने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (Mutation) कहते हैं। उत्परिवर्तन जीन की संरचना में परिवर्तन के कारण होता है । जीन की संरचना में परिवर्तन परावैगनी किरणों, कुछ रासायनिक पदार्थों तथा रेडियोधर्मी विकिरण के कारण होता है।

उत्परिवर्तन सिध्दान्त(Mutation Theory) के जनक ह्यूगो डी ब्रीज हैं।

लाभदायक उत्परिवर्तनः

  • विकिरण द्वारा पुष्प वाटिकाओं, फसलों, फलों, मछलियों आदि में क्रित्रिम उत्परिवर्तन उत्पन्न कर के नई-नई अच्छी नस्लें तैयार की जाती हैं।
  • काल्विसिन नामक रासायनिक पदार्थ द्वारा गेंदा एवं जीनिया के फूल की अच्छी नस्लें तैयार की जाती हैं।
  • परमाणवीय विकिरण द्वारा पौधों तथा जन्तुओं की नई-नई प्रजातियां विकसित की जा रही हैं।

हानिकारक उत्परिवर्तनः

हानिकारक उत्परिवर्तन के कारण जीवों की मृत्यु होती है।

सुजनिकी (EUGENICS)

प्रसिध्द जीव विज्ञानी ग्रेगर जांन मेण्डल के नियमों तथा अनुवांशिकता के नियमों की सहायता से मानव जाति की भावी पीढियों को सुधारने तथा उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के अध्ययन को सुजनिकी (EUGENICS) कहते हैं।

सुजनिकी (EUGENICS) के जनक सर फ्रान्सिस गाल्टन हैं

सुजनिकी विधि कितने प्रकार की होती है ?

सुजनिकी की विधि 02 प्रकार की होती है – स्वीकारात्मक तथा निषेधात्मक।

स्वीकारात्मक सुजनिकी विधि क्या है ?

स्वीकारात्मक सुजनिकी विधि के अन्तर्गत केवल योग्य तथा उचित अर्थात् अच्छे व्यक्तियों को ही विवाह की अनुमति मिलनी चाहिए ताकि उच्चकोटि के अनुवांशिक लक्षणों को प्रोत्साहन मिले तथा पीढी दर पीढी अच्छे बच्चों की संख्या में निरन्तर वृध्दि हो।

निषेधात्मक सुजनिकी विधि क्या है ?

निषेधात्मक सुजनिकी विधि के अन्तर्गत अयोग्य व्यक्तियों, पुस्तैनी रोगी एवं निम्न श्रेणी के अनुवांशिक लक्षणों वाले व्यक्तियों को सन्तानोत्पत्ति के लिए हतोत्साहित करना चाहिए।

हानिकारक गुणों को खत्म करने के लिए जीन प्रौद्योगिकी (Genetic Ingineering)की सहायता ली जा सकती है जिसके अन्तर्गत क्लोनिंग (Cloning) तथा डी0एन0ए0 रिकाम्बिनेन्ट तकनीक (DNA Recombinant Tachnique) का प्रयोग किया जाता है।

क्लोनिंग (Cloning) क्या है ?

क्लोनिंग जनन का एक ऐसा तरीका है जिसमें जनन अंग की कोई आवश्यकता नही होती । इस तकनीक में एक जीव के केन्द्रक को किसी दूसरे जीव के केन्द्रक को हटाकर उसके स्थान पर प्रत्यस्थापित किया जाता है । जिस जीव के केन्द्रक को प्रत्यस्थापित किया जाता है अगली सन्तान उसी के जीन गुण वाली होती है।

डी0एन0ए0 रिकाम्बिनेन्ट तकनीक (DNA Recombinant Tachnique)क्या है ?

जब किसी जीव के गुणसूत्र को रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम से विभाजित कर वैसे ही जीव का अलग गुणसूत्र जोडा जाता है, जिससे जीव के गुणसूत्र पर जीन की व्यवस्था बदल जाती है तथा नये गुण प्रकट होते हैं एवं अनावश्यक गुण हटाये जाते हैं तो इस विधि को डी0एन0ए0 रिकाम्बिनेन्ट तकनीक (DNA Recombinant Tachnique) कहते हैं।

डी0एन0ए0 रिकाम्बिनेन्ट तकनीक (DNA Recombinant Tachnique) का क्या उपयोग है ?

डी0एन0ए0 रिकाम्बिनेन्ट तकनीक का प्रयोग इन्टर फेरान, हार्मोन एवं इन्सुलिन का निर्माण करने में किया जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here