जैव विकास के सिध्दान्त (Theory of Organic evolution)

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Evolution

जैव विकास के सिध्दान्त (Theory of Organic evolution)

जैव विकास के मुख्य सिध्दान्त निम्लिखित हैः
  • लैमार्कवाद ( Lamarckism)।
  • डार्विनवाद ( Darwinism)।
  • उत्परिवर्तन ( Mutation )।

लैमार्कवाद क्या है ?

फ्रान्स के प्रसिध्द जीव वैज्ञानिक, “जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क” ने विकासवाद के सिध्दान्तों का वर्णन वर्ष- 1809 में प्रकाशित अपनी पुस्तक फिलासफिक जूलोजिक में किया है जिसे लैमार्कवाद कहा जाता है।

लैमार्कवाद के अनुसार- जीवों तथा इनके अंगों में लगातार बडे होते रहनें की प्राकृतिक प्रवृत्ति पायी जाती है। जीवों पर वातावरणीय परिवर्तन का सीधा प्रभाव पडता है जिसके कारण विभिन्न अंगों का उपयोग घटता-बढता रहता है। जिन अंगों का अधिक उपयोग किया जाता है वे अंग अधिक विकसित तथा मजबूत होते हैं तथा जिन अंगों का कम उपयोग होता है वे अंग कम मजबूत तथा कम विकसित होते हैं। जिन अंगो का उपयोग बिलकुल नही किया जाता वे अंग धीरे-धीरे निर्बल होने लगते हैं एवं धीरे-धीरे उनकी कार्य क्षमता कम होने लगती है तथा अन्त में विलुप्त हो जाते है। इस प्रकार जीवों के दवारा उपार्जित लक्षणों की वंशगति होती है जिसके कारण नयी-नयी प्रजातियों का उदय होता रहता है। जैसे– जिराफ की गर्दन का लम्बा होना, लुहार की भुजा का अधिक मजबूत होना आदि।

लैमार्कवाद को “अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिध्दान्त” भी कहा जाता है।

जिराफ की गर्दन काफी लम्बी क्यों होती है?

जिराफ के द्वारा अपनी सुरक्षा तथा आहार के लिए अन्य अंगों की अपेक्षा गर्दन का काफी अधिक प्रयोग किया गया जिसके कारण जिराफ की गर्दन लम्बी होती है।

लुहार की भुजा काफी अधिक मजबूत क्यों होती है?

लुहार द्वारा अपने व्यवसाय ( मजबूत एवं कठोर धातु लोहे की पिटाई तथा उपकरण बनाने )में अपनी भुजाओं के काफी अधिक प्रयोग किया जाता है जिसके कारण लुहार की भुजा काफी अधिक मजबूत होती है।

डार्विनवाद (Darwinism) क्या है?

इंग्लैण्ड के प्रसिध्द वैज्ञानिक चार्लस डार्विन द्रारा प्रतिपादित  क्रम विकास के सिध्दान्त को  डार्विनवाद ( Darwinism)  कहते हैं।

डार्विनवाद के अनुसार सभी जीवों में प्रचुर सन्तानोत्पत्ति की क्षमता होती है जिसके कारण जीवों की आवादी अधिक होने के कारण जीवों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे जीवों से जीवनपर्यन्त संघर्ष करना पडता है। ये संघर्ष सजातीय, अन्तर्जातीय तथा पर्यावरणीय होते हैं। दो सजातीय जीव आपस में विलकुल समान नही होते। इनमें विभिन्नताएं इनके जनकों के वंशानुक्रम के कारण होती है। कुछ विभिन्नताएं जीवन संघर्ष के लिए लाभदायक तथा कुछ हानिकारक होती हैं। उपयोगी विभिन्नताएं जीवों में पीढी दर पीढी चलती रहती है तथा काफी लम्बे समय के बाद उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से काफी भिन्न हो जाते हैं तथा नई जाति बन जाती है।

काफी समय बाद डार्विनवाद को जीनवाद के ढांचे में ढाल दिया गया जिसे नव डार्विनवाद कहा जाता है।

नव डार्विनवाद अनुसार- किसी जाति पर एक साथ निम्नांकित कारकों का प्रभाव पडता हैः

  • विविधता।
  • उत्परिवर्तन।
  • प्रकृतिवरण।
  • जनन।

उक्त कारकों के एक साथ प्रभावों के कारण एक नई जाति बन जाती है। यानी जीन में साधारण परिवर्तनों के परिणामस्वरूप जीवों की नई जातियां बनती हैं जिनमें जीन परिवर्तन के कारण विभिन्नताएं पायी जाती हैं।

उत्परिवर्तन (Mutation) क्या है ?

इस सिध्दान्त को प्रसिध्द वैज्ञानिक ह्यूगो डी ब्रीज ने प्रतिपादित किया था। इस सिध्दान्त के अनुसारः

  • नवीन जीव- जातियों की उत्पत्ति लक्षणों में छोटी-छोटी तथा स्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढी दर पीढी संचय एवं क्रमिक विकास के फलस्वरूप नही होती, बल्कि यह उत्परिवर्तनों के परिणामस्वरूप होती है। इस प्रकार से उत्पन्न जाति का प्रथम सद्स्य उत्परिवर्तक कहलाता है।
  • सभी जीव जातियों में उत्परिवर्तन की प्रकृतिक प्रवृत्ति होती है।
  • उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं।
  • उत्परिवर्तन किसी एक अंग में या एक से अधिक अंगों में हो सकते हैं।
  • जाति के विभिन्न समुदाय़ों में भिन्न-भिन्न उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

उत्परिवर्तन सिध्दान्त के जनक कौन हैं ?

उत्परिवर्तन सिध्दान्त के जनक ह्यूगो डी ब्रीज हैं।