प्राचीन भारत में लोकतन्त्र (Democracy in ancient India)

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प्राचीन भारत में लोकतन्त्र (Democracy in ancient India)

लोकतन्त्र का अर्थ, जनता का शासन” है । लोकतन्त्र का दूसरा नाम प्रजातन्त्र है। लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली में जनता के लोग स्वयं आपना शासक चुनते हैं । जनता द्वारा जनता के लिए जनता के शासन को ही “लोकतन्त्र कहते हैं

आधुनिक लोकतन्त्र की तरह भारत में प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली का प्रयोग किया जाता था। वर्तमान भारतीय संसद की तरह प्राचीन काल में भी परिषदों का गठन होता था जिसके द्वारा गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन किया जाता था। किसी मुद्दे पर निर्णय होने से पूर्व पक्ष विपक्ष में खुलकर चर्चा होती थी, जोरदार बहस होती थी। तत्पश्चात सर्वसम्मति से निर्णय पारित किया जाता थ । सहमति न होने की दशा में बहुमत प्रक्रिया अपनाई जाती थी बहुमत से लिए गए निर्णय को, “भूयिसिक्किम कहा जाता था जिसके लिए वोटिंग का सहारा लेना पड़ता था। वोटों को छन्द कहा जाता था। वर्तमान समय के  निर्वाचन आयुक्त की भांति “शलाकाग्राहकनामक अधिकारी चुनाव कार्यों की देख – रेख करता था तथा वोटों का हिसाब रखता था। वोट देने की तीन प्रणालियां- 1-  गूढक ( गुप्त रूप से मतदान)  2-  विवृतक ( प्रत्यक्ष रूप से मतदान ) तथा 3- संकर्णजल्पक ( शलाकाग्राहक की कान में चुपके से कहना ) प्रचलित थीं ।

शासन के संचालन के लिए अनेक मन्त्रालय गठित थे, जिसमें योग्यता के आधार पर अधिकारियों का चुनाव किया जाता था। मन्त्रालय के मुख्य विभाग- (1) विदेश विभाग (2) जनगणना विभाग  (3) औद्योगिक एवं शिल्प सम्बन्धी विभाग, तथा (4) क्रय- विक्रय के नियमों का निर्धारण नामक  विभाग थे।

मनुस्मृति, अर्थशास्त्र तथा महाभारत में मन्त्रिमण्डल का उल्लेख मिलता है जिन्हें यजुर्वेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में “रत्नकहा गया है। मनु के अनुसार मन्त्रिमण्डल में 7 सदस्य- (1) पुरोहित (2) प्रधान अथवा प्रधानमन्त्री  (3) उपराज (4) सचिव (5) सुमन्त्र (6) अमात्य तथा (7) दूत होते थे। पुरोहित राजा का गुरु होता था जो राजनीति तथा धर्म में निपुण होता था। प्रधान अथवा प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल के सभी विभागों की देखभाल करता था। उपराज राजा की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था का संचालन करता था। सचिव राज्य की सुरक्षा व्यवस्था सम्बन्धी कार्य देखता था। सुमन्त्र राज्य के आय-व्यय का लेखा-जोखा रखता था। अमात्य का कार्य सम्पूर्ण राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करना था। दूत का कार्य  गुप्तचर विभाग को संगठित करना था।

आधुनिक युग की तरह प्राचीन काल में भी पंचायती राज व्यवस्था विद्यमान थी, शासन की मूल इकाई “गांव” थी जिसका प्रमुख ग्रामणी” होता था। प्रत्येक गांव में एक “ग्रामसभा” होती थी जिसका कार्य गांव की समस्याओं का निपटारा करना, आर्थिक उन्नति, रक्षा कार्य तथा समुन्नत शासन की स्थापना करके अपने  गांव को आदर्श गांव बनाना था।

सम्पूर्ण राज्य छोटी-छोटी शासन इकाइयों में बंटा था, प्रत्येक इकाई अपने में एक छोटे राज्य सदृश थी। समस्त राज्य की शासन सत्ता एक सभा में निहित थी जिसके सदस्य उन शासन इकाइयों के प्रधान होते थे। एक निश्चित अवधि के लिए सभा का एक अध्यक्ष निर्वाचित होता था । सभा की बैठक एक भवन में होती थी जिसे “सभागार” कहा जाता था। अपराधियों को दण्ड देने का अधिकार केवल राजा को था जो धर्मशास्त्र तथा पूर्व की नजीरों के आधार पर अपराधियों को दण्डित करता था। प्राचीन काल के प्रमुख गणराज्य शाक्य, लिच्छवि, वज्जि,  अम्बष्ठ,  अग्नेय, अरिष्ट, कठ, कुणिन्द, क्षुद्रक, पातानप्रस्थ आदि हैं।

. लोकतन्त्र क्या है?

जनता द्वारा जनता के लिए शासन को लोकतन्त्र कहते हैं।

. लोकतन्त्र का क्या अर्थ है?

जनता का शासन या प्रजातन्त्र।

. भारत में प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में भूयिसिक्किम क्या था?

बहुमत से लिए गए निर्णय को, “भूयिसिक्किम कहा जाता था जिसके लिए वोटिंग का सहारा लेना पड़ता था।

. भारत में प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव कार्यो की देख-रेख कौन करता था?

शलाकाग्राहकनामक अधिकारी चुनाव कार्यों की देख – रेख करता था तथा वोटों का हिसाब रखता था जो कि वर्तमान समय के  निर्वाचन आयुक्त की भांति कार्य करता था।

. भारत में प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव की कौन-कौन सी प्रणालियां प्रचलित थीं?

वोट देने की तीन प्रणालियां- गूढक ( गुप्त रूप से मतदान), विवृतक (प्रत्यक्ष रूप से मतदान) तथा संकर्णजल्पक ( शलाकाग्राहक के कान में चुपके से कहना ) प्रचलित थीं।

. प्राचीन काल में शासन की मूल इकाई क्या थी?

प्राचीन काल में शासन की मूल इकाई “गांव” थी जिसका प्रमुख ग्रामणी” होता था।

. प्राचीन काल में राजा का गुरु कौन होता था?

राजा का गुरु पुरोहित होता था जो राजनीति तथा धर्म में निपुण होता था।

. प्राचीन काल में राजा की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था का संचालन कौन करता था?

उपराज।

. प्राचीन काल में राज्य की सुरक्षा व्यवस्था सम्बन्धी कार्य कौन देखता था?

सचिव

. प्राचीन काल में राज्य के आय-व्यय का लेखा-जोखा कौन रखता था?

सुमन्त्र

. प्राचीन काल में दूत का क्या कार्य था?

गुप्तचर विभाग को संगठित करना।

. प्राचीन काल में अपराधियों को दण्ड देने का अधिकार किसे था?

अपराधियों को दण्ड देने का अधिकार केवल राजा को था।

. प्राचीन काल में गांव की समस्याओं का निपटारा करना, आर्थिक उन्नति, रक्षा कार्य तथा समुन्नत शासन की स्थापना करके अपने  गांव को आदर्श गांव बनाना किसका कार्य था?

ग्रामसभा।

. प्राचीन काल में वोटों को क्या कहा जाता था?

छन्द।

. मनु के अनुसार प्राचीन काल में मन्त्रिमण्डल में कितने सदस्य होते थे?

मनु के अनुसार मन्त्रिमण्डल में 7 सदस्य होते थे।

. प्राचीन काल में सभागार क्या था?

बैठक का भवन।

. प्राचीन काल में मन्त्रिमण्डल का उल्लेख किन-किन ग्रन्थों में मिलता है?

मनुस्मृति, अर्थशास्त्र तथा महाभारत।

. मन्त्रिमण्डल को यजुर्वेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में क्या कहा गया है?

रत्न।

. प्राचीन काल के प्रमुख गणराज्य कौन-कौन थे?

शाक्य, लिच्छवि, वज्जि,  अम्बष्ठ,  अग्नेय, अरिष्ट, कठ, कुणिन्द, क्षुद्रक तथा पातानप्रस्थ थे।