Saturday, September 19, 2020
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प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से सम्बन्धित विभिन्न उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्गत नजीरें / निर्णय

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प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से सम्बन्धित विभिन्न उच्च न्यायालयों  एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्गत नजीरें / निर्णय

[1] स्टेट ऑफ़ एम्० पी० बनाम सालीग्राम तथा अन्य,१९७१ जे० एल० जे० २९२ : १९७१ एम्० एल० जे० — भारतीय दण्ड संहिता- १८६० के अधीन ऐसे कार्यों के प्रति जो की स्वयं में अपराध न हों , वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार की मांग नही की जा सकती है |

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 [2] मुंशी राम बनाम देहली एडमिनिस्ट्रेशन , ए० आई० आर० १९६८ सु० को० ७०२  — यदि दोनों पक्ष शक्ति परिक्षण के अधीन हों तो ऐसी दशा में वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग का प्रश्न नही उत्पन्न होता है |

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[3] हरे कृषण सिंह एवं अन्य बनाम बिहार , राम कुमार  उपाध्याय बनाम बिहार , ए० आई० आर० १९८८ एस० सी० ८६३ : १९८८ क्रिमिनल एल० जे० ९२५ ;१९८८ -– जहाँ पर आक्रामक किसी हथियार से लैश न हो अर्थात निहत्था हो वहां पर सम्बन्धित व्यक्ति को किसी भी प्रकार के प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त नही होगा |

 

[4] राम मनोहर बनाम म० प्र० राज्य ,१९८ म० नि० सा० ७८  (म० प्र० ) -—  प्रश्नगत मामले में घटना  सार्वजानिक स्थल नल पर हुयी जहाँ पर फरियादी के लडकों को आता हुआ देखकर अभियुक्तगण ने लाठियां उठा ली थीं जिससे फरियादी पार्टी का हमले का डर हुआ |फरियादी पार्टी कोई लाठी नही लिए थी इसलिए फरियादी पार्टी को पत्थर उठा कर फेंकना पड़ा | ऐसी स्थिति में फरियादी पार्टी को पत्त्थर फेंकना अपनी आत्मरक्षा का अधिकार था क्योंकि अभियुक्तगणों का सार्वजनिक नल पर लाठियों से लैश होने का कोई औचित्य नही था |

       यहीं पर अभियुक्त गणों ने फरियादी को चाटे मारा और पटक दिया | ऐसी स्थिति में फरियादी आत्मरक्षा के अधिकार का दावा नही कर सकता |

 

[5] बाबु उर्फ़ अहमद बनाम मध्य प्रदेश राज्य ,१९९० म० नि० सा० 17  (म० प्र०) ५९  — आत्म प्रतिरक्षा को स्थापित करने का भार अभियुक्त पर होता है |ऐसे भार का उन्मोचन अभिलेख पर उपलब्ध तत्विक्ताओं के अधर पर इस अभिवचन के पक्ष में सम्भाव्यताओं की प्रबाल्यता प्रदर्शित करके उन्मोचित किया जाता है | ऐसे अधिकार का प्रयोग विधि विरुद्ध आक्रमण को मात्र निरसित करने के लिए किया जा सकता है , न  की बदला लेने के लिए  |

 

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[6] अम्बाराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य , १९८८ क्रिमिनल ला० रि० ( M.P.) २८५ -– जहाँ पर प्राइवेट प्रतिरक्षा के मामले में अभियुक्त के शरीर पर कई क्षतियाँ पायीं जाती हैं | ऐसी दशा में अभियोजन साक्ष्य विस्वसनीय नही है एवं महत्वपूर्ण साक्षियों को पेश न किया गया हो तो प्रतिरक्षा के अभिवाक के आधार पर अभियुक्त संदेह का लाभ पाने का हकदार होगा |

 

[7] बिनुधर नायक बनाम स्टेट ऑफ़ उड़ीसा , १९८५ (५९) सी० एल० टी० १५५

 प्रश्नगत मामले में बंदूक से हत्या के मामले में घटना स्थल एवं मृतक को गोली लगना विवादित नही था बल्कि हत्या का ढंग विवादित था | अपीलार्थी का कथन था कि आत्मरक्षा में गोली चलायी थी | दो प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों की घटना स्थल पर उपस्थिति का कारण संदिग्ध पाया गया इसलिए साक्ष्य अमान्य कर दिया गया | अपीलार्थी को गम्भीर चोटें आयीं थी जिसके बारे में अभियोजन द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण संदिग्ध था जिससे आक्रामक का निर्णय करना असम्भव था | अपीलार्थी अपने आत्मरक्षा के प्रतिवाद को इंगित करने में सफल रहा | अभियोजन केस युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नही हो सका | अपील स्वीकृत की गयी | दोषसिद्ध एवं दंडादेश अपास्त किया गया |  अपीलार्थी  दोषमुक्त हो गये | प्रतिभू उन्मोचित की गयी |

 

 

 

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