अन्वेषण का उद्देश्य, आवश्यकता तथा महत्व (Aim, Neccessrity and Importence of Investigation )

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File Stack and Magnifying Glass

अन्वेषण का उद्देश्यः

स्टेट आफ उत्तर प्रदेश बनाम् भगवन्त किशोर A.I.R. 1964 S.C. 221 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः “अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य किसी अपराध से सम्बन्धित साक्ष्य साक्ष्य संकलित करना है। किसी मामले में साक्ष्य के अभाव में किसी भी अभियुक्त के विरूध्द दोषारोपण नही किया जा सकता है”।

कोई भी मामला पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नही किया जा सकता है। अन्वेषणकर्ताधिकारी को अन्वेषण करते समय अन्वेषण के प्रयेक पहलू को ध्यान में रखना होता है। अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है किः-

  1. क्या कोई अपराध कारित किया गया है या नही?
  2. यदि अपराध कारित किया गया है तो कौन सा अपराध कारित किया गया है?
  3. अपराध किस व्यक्ति द्वारा कारित किया गया है?

उपरोक्त तीनों बिन्दुओं पर सारा कार्य साक्ष्य संकलन के माध्यम से ही किया जाता है।

जमुना चौधरी बनाम् बिहार राज्य (1974) 3 SCC 774 : 1974 SCC (Cri) 250 : AIR 1974 SC 1822  में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः “अन्वेषण का एकमात्र उद्देश्य साक्ष्य संकलित करना ही नही है, बल्कि मामले की तह में जाकर निरापद सत्य का पता लगाना है”।

एम0 जे0 फिटजराल्ड, हैण्डबुक आफ क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन, संस्करण 1977 के पेज संख्या 12 के अनुसारः “किसी मामले में प्रथम दृष्टया अभियुक्त के निर्दोष होने की उपधारणा की जाती है। अभियुक्त यदि दोषी है तो उसे संदेह से परे साबित किया जाना आवश्यक है। किसी भी अपराध में किसी व्यक्ति को अन्वेषणकर्ताधिकारी द्वारा अपनी पुरानी तकनीक तीर तुक्के द्वारा सम्मिलित नही किया जा सकता है”।

अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य अप्रकट वास्तविक तथ्य को सामने लाना होता है।

स्टेट आफ कलकत्ता बनाम् मणीन्द्रनाथ 1960 Cri LJ 338 में माननीय उच्च न्यायालय कलकत्ता द्वारा पारित निर्णय को अनुसारः “किसी मामले में किसी व्यक्ति को येन – केन प्रकारेण दोषसिध्दि करना के प्रयास करना न तो कभी अन्वेषण का उद्देश्य रहा है और न हो सकता है। अन्वेषणकर्ताधिकारी का यह परम कर्तव्य है कि वह मामाले की तह में जाकर पता लगाये कि वस्तुतः अभियुक्त ने कोई अपराध कारित किया है या नही। न्याय के लिए यह परमावश्यक है”।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि सत्य – किसी मामले में असत्य में से सत्य की खोज करना, भ्रामक तथ्यों को दूर करना तथा मिथ्या और छटे हुए कथनों में से सच्चाई का पता लगाना किसी मामले के अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य है।

अन्वेषण की आवश्यकता तथा महत्वः

राज्य के प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना, संरक्षण प्रदान करना तथा राज्य में अपराधों की रोंकथम करना लोक कल्याणकारी राज्य का प्रमुख कर्तव्य है। राज्य में अपराधों की रोंकथाम करने हेतु अभियुक्त की गिरफ्तारी कर उसके खिलाफ मामले का विचारण कर उसे दण्डित करना राज्य के इसी कर्तव्य का ही एक मुख्य अंग है।

यह बात सत्य है कि गिरफ्तारी किये जाने से उस व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन होता है परन्तु राज्य में अपराधों की रोंकथाम के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है।

विधिशास्त्र का सर्वमान्य सिध्दान्त है कि, “सौ दोषी व्यक्ति छूट जाए परन्तु एक भी निर्दोष व्यक्ति दण्डित न होने पाये”।

यानी किसी एक भी निर्दोष व्यक्ति को न तो गिरफ्तार किया जाए और न ही उसके विरूध्द विचारण कर उसे अनावश्यक रूप से परेशान किया जाय। इसीलिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और उसे न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने के पहले अन्वेषण का प्राविधान किया गया है । अन्वेषण के माध्यम से मामले की छानबीन और साक्ष्य संकलन के द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि अभियुक्त के विरूध्द कोई अपराध बनता भी है या नही । प्रकरण की तह में जाकर अप्रकट सत्यता का पता लगाना ही  अन्वेषण का परम उद्देश्य होता है।

एस0एन0 शर्मा बनाम् विपिन कुमार तिवारी (1970) 1 SCC 653 : 1970 SCC (Cri) 258 : AIR 1970 SC 786  में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः “यदि अन्वेषणकर्ताधिकारी अपने कर्तव्य से विमुख होकर दुर्भावनापूर्वक किसी मामले के अन्वेषण का संचालन करता है तो उच्च न्यायालय उसे रद्द कर सकता है”।

शरीफ अहमद बनाम् स्टेट AIR 2009 SC 2691 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः “न्यायालय किसी अपराध विशेष पर जोर देते हुए उस पर तदनुसार अन्वेषण करने का निर्देश अन्वेषणकर्ताधिकारी को नही दे सकता है”।

इस प्रकार किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य के लिए समुचित न्याय प्रशासन हेतु प्रत्येक अपराध का निष्पक्ष अन्वेषण परमावश्यक है।