परिवाद (COMPLAINT)

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COMPLAINT

परिवाद (COMPLAINT)

परिवाद (Complaint) किसी न्यायिक कार्यवाही का प्रथम चरण है जिसके न्यायालय में प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक कार्यवाही आरम्भ की जाती है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा–2(घ) के अनुसार (According sec. 2(d) Code of Criminal Procedure) “परिवाद (Complaint) का अभिप्राय दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 के अन्तर्गत कार्यवाही किये जाने की दृष्टि से लिखित या मौखिक रूप में किसी मजिस्ट्रेट से किया गया वह कथन है कि किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया है, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात  परन्तु इसके अन्तर्गत पुलिस रिपोर्ट सम्मिलित नही है।

म्युनिसिपल बोर्ड आफ मिर्जापुर बनाम रेजीडेण्ट इंजीनियर मिर्जापुर इलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी, 1971 क्रि0 ला0 ज0 474 में पारित माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसारः “परिवाद (Complaint) का अभिप्राय ऐसे मैखिक या लिखित दोषारोंपण से है जो कार्यवाही के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।“

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 257 के अनुसार (According sec. 257 Code of Criminal Procedure) समन मामलों के परिवाद में न्यायालय द्वारा अन्तिम आदेश पारित किए जाने के पूर्व परिवादी न्यायालय की अनुमति से कभी भी परिवाद वापस ले  सकता है।

अचरू बनाम एम्परर, (1913) पी0 आर0 क्रि0 35 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 257 मात्र समन मामलों पर ही प्रयोज्य होती है तथा ऐसे मामलों में परिवादी कभी भी न्यायालय से अनुमति प्राप्त कर परिवाद वापस ले सकता है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 256 (1) के अनुसार (According sec. 256(1) Code of Criminal Procedure) किसी परिवाद में न्यायालय द्वारा समन जारी किए जाने पर यदि परिवादी नियत तिथि व दिनांक पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित नही होता है तो मजिस्ट्रेटः

  1. सुनवाई के दिनांक को आगे के लिए स्थगित कर सकता है।
  2. अभियुक्त को दोषमुक्त कर सकता है।

परन्तु जहां पर

1. परिवादी का नेतृत्व उसके अधिवक्ता या परिवाद का संचालन करने वाले अधिकारी द्वारा किया जा रहा है।

अथवा

2.मजिस्ट्रेट की राय में परिवादी की व्यक्तशः उपस्थिति जरूरी नही है।

वहां पर मजिस्ट्रेट आगे की कार्यवाही आरम्भ कर सकता है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 256 (2) के अनुसार (According sec. 256(2) Code of Criminal Procedure) न्यायालय द्वारा निर्णय पारित किए जाने के पूर्व यदि परिवादी की मृत्यु हो जाती है तो मजिस्ट्रेट दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 256 (1) के अनुसार कार्यवाही कर सकता है।

लाल मोहम्मद बनाम ट्रैफिक इंस्पेक्टर लखनऊ (1971) इलाहाबाद, क्रिमिनल केसेज 126 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः न्यायालय द्वारा समन जारी किए जाने पर यदि परिवादी नियत तिथि व दिनांक पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित नही होता है तो मजिस्ट्रेट सुनवाई के दिनांक को आगे के लिए स्थगित कर सकता है।

परिवाद (Complaint) का मुख्य उद्देश्य उस मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किया जाना है जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया गया है।

परिवाद के आवश्यक लक्षण (Essential symptoms of complaint)

  1. परिवाद (Complaint) लिखित या मौखिक किसी भी रूप में हो सकता है।
  2. परिवाद (Complaint) मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
  3. परिवाद (Complaint) का मुख्य उद्देश्य उस मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किया जाना है जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया गया है।
  4. किसी भी शिकायत को तब तक परिवाद (Complaint) नहीं माना जाता है जब तक कि वह विधि द्वारा दण्डनीय कोई अपराध गठित नहीं करता हो।
  5. पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद (Complaint) नहीं माना जाता परन्तु यदि अन्वेषण के पश्चात असंज्ञेय अपराध होना प्रकट हो तो पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाता है।
  6. हलीमुद्दीन बनाम अशोक सीमेण्ट, 1976 क्रि0 लां0 ज0 449 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः “परिवादी द्वारा परिवाद (Complaint) में उस साक्ष्य का उल्लेख किया जाना आवश्यक नहीं है जो उसके पास विद्यमान है।“
  7. परिवाद (Complaint) में अपराधी का उल्लेख होना आवश्यक नहीं है मात्र आवश्यक यह है कि वह अपराधी के चरित्र को स्पष्ट तथा निश्चित करता हो।
  8. परिवाद (Complaint) की कार्यवाही दण्ड प्रक्रिया संहिता में वर्णित रीति से की जाती है।

परिवाद तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट में अन्तर (Difference between Complaint and First Information Report)

  1. परिवाद (Complaint) न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट अभियोग पंजीयन हेतु पुलिस अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।
  2. परिवाद (Complaint) प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की जाती है जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट प्राप्त होने पर अन्वेषण प्रारम्भ किया जाता है।
  3. परिवाद (Complaint) पर मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के उपरान्त अपराध का संज्ञान लिया जाता है जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट पर पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण के पश्चात धारा- 173 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार पुलिस रिपोर्ट तैयार कर सम्बन्धित न्यायालय को प्रेषित की जाती है।
  4. परिवाद (Complaint) को मजिस्ट्रेट अन्वेषण हेतु पुलिस अधिकारी को भेज सकता है परन्तु प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस अधिकारी द्वारा जांच हेतु मजिस्ट्रेट को नहीं भेजी जा सकती है।

. परिवाद (Complaint) का क्या अर्थ है ?

शिकायत, निन्दा या दोषारोंपण।

. क्या पुलिस रिपोर्ट को परिवाद (Complaint) माना जा सकता है ?

सामान्यतया पुलिस रिपोर्ट को परिवाद (Complaint) नहीं माना जाता है परन्तु यदि किसी मामले में अन्वेषण के पश्चात् किसी असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो ऐसी दशा में पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई पुलिस रिपोर्ट को परिवाद तथा पुलिस अधिकारी को परिवादी माना जाता है।

. क्या रेलवे सुरक्षा बल अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को परिवाद माना जा सकता है ?

 स्टेट आफ बिहार बनाम चन्द्र भूषण सिंह ए0 आई0 आर0 2001 एस0 सी0 429 में  रेलवे सम्पत्ति (अविधिपूर्ण कब्जा) अधिनियम-1966 की धारा-8 के अन्तर्गत रेलवे सुरक्षा बल अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को उच्चतम न्यायालय द्वारा परिवाद (Complaint) माना गया है।

. परिवाद (Complaint) किसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है ?

परिवाद (Complaint) न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

. परिवाद (Complaint) की जांच किसके द्वारा की जाती है ?

परिवाद (Complaint) की जांच  मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है।

. परिवाद (Complaint) का क्या उद्देश्य है ?

परिवाद (Complaint) का मुख्य उद्देश्य उस मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किया जाना है जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया गया है।

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