पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अभियुक्त की जमानत का विरोध किया जाना (Police officer opposing bail of accused)

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Police Officer

पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अभियुक्त की जमानत का विरोध किया जाना (Police officer opposing bail of accused)

जब कोई अभियुक्त किसी अपराध में गिरफ्तार होकर या न्यायालय में आत्मसमर्पण कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा जाता है तब वह जेल से ही अपनी जमानत के लिए न्यायालय को प्रार्थना पत्र देता है। न्यायालय द्वारा उक्त प्रार्थना पत्र पर सम्बन्धित पी0 ओ0, ए0 पी0 ओ0 या ए0 डी0 जी0 सी0 से अभियोजन पक्ष की टिप्पणी मांगी जाती है। सम्बन्धित पी0 ओ0, ए0 पी0 ओ0 या ए0 डी0 जी0 सी0 द्वारा उक्त प्रार्थना पत्र सम्बन्धित थाने पर भेजकर थाना प्रभारी से प्रस्तरवार टिप्पणी एवं आपराधिक इतिहास मांगा जाता है। यहीं से पुलिस द्वारा अभियुक्त की जमानत का विरोध आरम्भ होता है।

अभियुक्त के जमानत प्रार्थना पत्र पर जमानत के विरोध में पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाही (Action to be taken by the police against the bail on the bail application of the accused)

  1. विवेचना के दौरान प्रकाश में आए तथ्यों तथा अभिलिखित साक्ष्यों के आधार पर जमानत प्रार्थना पत्र पर प्रस्तरवार टिप्पणी तैयार कर जमानत पर सुनवाई होने से पूर्व सम्बंन्धित पी0 ओ0, ए0 पी0 ओ0, ए0 डी0 जी0 सी0 के पास भिजवाया जाए ताकि वे भली-भांति अध्ययन कर तैयारी कर अभियोजन पक्ष न्यायालय के समक्ष रख सकें।
  2. अभियुक्त के जमानत प्रार्थना पत्र पर तैयार का गई प्रस्तरवार टिप्पणी में अभियुक्त की पूर्व सजाओं, पूर्व आपराधिक इतिहास तथा अभियुक्त के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्यों का पूर्ण विवरण अवश्य अंकित किया जाए जो उसे प्रथम दृष्टया दोषी सिद्ध करने में सहायक हो।
  3. यदि अभियुक्त का नाम पता तस्दीक न हुआ हो तो इस पर अभियुक्त की जमानत का विरोध किया जाए क्योंकि जमानत पर रिहा होने पर उक्त अभियुक्त फरार हो सकता है।
  4. यदि अभियुक्त की कार्यवाही शिनाख्त होनी हो तो इसे आधार बनाकर जमानत का विरोध किया जाए।
  5. यदि अभियुक्त पूर्व से इसी प्रकार के अपराध में जमानत पर रहकर पुन: उसी प्रकार का अपराध किया है तो इस बिन्दु पर भी जमानत का विरोध किया जाए।
  6. यदि अभियुक्त द्वारा जमानत पर छूटे जाने पर पुन: अपराध की पुनरावृति किए जाने की संभावना हो तो इस बिन्दु पर भी जमानत का विरोध किया जाए।
  7. यदि जमानत पर रिहा किए जाने पर अभियुक्त के फरार हो जाने या गवाहों को प्रभावित किए जाने की संभावना हो तो इस बिन्दु पर भी जमानत का विरोध किया जाए।
  8. यदि संभव हो तो जमानत पर सुनवाई के समय विवेचक को स्वयं सम्बन्धित अभिलेखों के साथ न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहना चाहिए, ताकि न्यायालय द्वारा किसी तथ्य के सम्बन्ध में पूंछे जाने पर उसका उचित स्पष्टीकरण देते हुए जमानत का विरोध किया जा सके।
  9. यदि अभियुक्त से अभियोग से सम्बन्धित किसी वस्तु की बरामदगी की संभावना हो तो इस बिन्दु पर भी जमानत का विरोध किया जाए ताकि उसे पुलिस कस्टडी रिमाण्ड पर लेकर बरामदगी की जा सके।
  10. यदि कोई अभियुक्त शरीर या सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध में धारा 437(1) सी0 आर0 पी0 सी0 के अन्तर्गत न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा किया जाता है तो विवेचक न्यायालय से अनुरोध करके धारा 437(3) सी0आर0पी0सी0 के अन्तर्गत जमानत के सम्बन्ध में उस पर कोई शर्त लगवा सकता है। जैसे- हत्या के अपराध में अभियुक्त को जमानत देते समय न्यायालय यह शर्त लगा सकता है कि अभियुक्त घटनास्थल वाले थाना क्षेत्र में नहीं जाएगा।
  11. जमानत प्रार्थना पत्र पर प्रस्तरवार टिप्पणी तैयार करते समय ऐसा कोई तथ्य न अंकित किया जाए जिसे न्यायालय में सिद्ध न किया जा सके।

मजिस्ट्रेट के द्वारा अवयस्क, स्त्री तथा असक्त की जमानत (Bail of Minor, Female and Disabled by Magistrate)

चोकि बनाम स्टेट, ए0 आई0 आर0 1957 राजस्थान, 10; 1958 राजस्थान एल0 डब्ल्यू0 567; 1957 क्रि0 ला0 ज0 102; मैबम विधु सिंह बनाम मनीपुर एडमिनिस्ट्रेशन, ए0 आई0 आर0 1959 मनी 47; 1959 क्रि0 लां0 ज0 1453 के अनुसारः

किसी मामले में जहां कोई व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का अभियुक्त है तथा विश्वास करने का तर्कसंगत आधार प्रतीत होता है कि वह ऐसे अपराध का अपराधी रहा है, न्यायालय अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर सकता है यदि व्यक्ति 16 वर्ष की उम्र के नीचे का है या एक स्त्री है या कोई बीमार या अशक्त व्यक्ति है।

स्टेट बनाम सरदूल सिंह, 1975 क्रि0 ला0 ज0 1348; फजल नेवाज जंग बनाम स्टेट, ए0 आई0 आर0 1952 हैदराबाद 30; 1952 क्रि0 ला0 ज0 873 के अनुसारः

बीमार व्यक्ति को प्रत्येक बीमारी जमानत का हकदार नहीं बनाती है। वह बीमारी जो जीवन के जोखिम या खतरों को शामिल करती है, अभियुक्त को जमानत का हकदार बनाती है।