Major Act

अभियुक्त के अधिकार (Power of Accused)

(Power of )

दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 तथा उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन में अभियुक्त को निम्नांकित अधिकार प्रदान किए गए हैः

(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 50 के अनुसारः जब कोई व्यक्ति  किसी जमानतीय अपराध में पुलिस अधिकारी द्वारा बिना वारण्ट गिरफ्तार किया जाता है तो उक्त व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसे गिरफ्तारी का कारण बताया जाए तथा यह भी बताया जाए अपराध जमानतीय है तथा जमानत की व्यवस्था करके वह अपनी जमानत करा सकता है।

(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 75 के अनुसारः यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को वारण्ट पर गिरफ्तार कर रहा है तो उक्त व्यक्ति  के द्वारा अपेक्षा किए जाने पर उसे उक्त वारण्ट दिखाया जाएगा।

(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 51 के अनुसारः यदि कोई व्यक्ति किसी पुलिस अधिकारी द्वारा बिना वारण्ट या वारण्ट पर गिरफ्तार किया जाता है जिसमें उसे जमानत नहीं दी जा सकती अथवा जमानतीय अपराध में गिरफ्तार किया जाता है परन्तु वह जमानत देने असमर्थ है तथा उक्त गिरफ्तार व्यक्ति के कब्जे से कोई वस्तु कब्जे पुलिस में ली जाती है उसकी रसीद गिरफ्तारकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा उसे अवश्य दी जाएगी।

(4) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 436 के अनुसारः यदि कोई व्यक्ति जमानतीय अपराध में गिरफ्तार किया जाता है तो उसके द्वारा जमानत दिए जाने पर तत्काल उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा।

(5) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 54 के अनुसारः गिरफ्तार शुदा व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसके द्वारा  अनुरोध  किये जाने पर  रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसाई से उसका डॉक्टरी परीक्षण कराया जाए । इस धारा का मुख्य उद्देश्य गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस प्रताडना से बचाना है।

(6) विवेचना के दौरान पुलिस अधिकारी द्वारा पूंछतांछ किए जाने पर अभियुक्त स्वयं को निर्दोष होने का विवरण प्रस्तुत कर सकता है तथा विवेचक का यह कर्तव्य है कि विवेचना का निष्कर्ष निकालने के पूर्व अभियुक्त द्वारा दी गई उक्त सफाई की जांच अवश्य की जाए।

(7) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 167 के अनुसारः गिरफ्तारी के बाद किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में नहीं रखा जाएगा  तथा उसे सम्बन्धित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएग । यदि गिरफ्तारी के बाद 24 घण्टे से अधिक अवधि तक उसे पुलिस अभिरक्षा में रखा जाता है तो ऐसी गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए मजिस्ट्रेट रिमाण्ड देने से इन्कार कर सकता है।

(8) क्रिमिनल रिट याचिका संख्या- 539 / 86 डी0 के0 बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 18- 12- 1996 को पारित निर्णय के अनुसारः यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया गया है तो पूंछतांछ के दौरान उसे  अपने अधिवक्ता से मिलने दिया जायेगा।

(9) यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध में गिरफ्तार होकर या न्यायालय में आत्मसमर्पण कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल में निरुद्ध है तथा विवेचक द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता में निर्धारित अवधि ( 10 वर्ष या उससे अधिक की कारावास से दण्डनीय अपराध में 90 दिवस तथा अन्य अपराधों में 60 दिवस ) के अन्दर आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो अभियुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के अनुसार जमानत पाने का अधिकार होगा।

(10) उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के पैरा- 305 के अनुसारः गिरफ्तार व्यक्ति को थाने पर रखे जाने पर थाने की स्थाई अग्रिम धनराशि से भोजन पाने का अधिकार है।

() पुलिस रेगुलेशन के पैरा- 116 के अनुसारः कार्यवाही शिनाख्त वाले अभियुक्तों को अपना चेहरा छुपाए रखने का पूर्ण अधिकार है।

(12) क्रिमिनल रिट याचिका संख्या- 539 / 86 डी0 के0 बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 18- 12- 1996 को पारित निर्णय के अनुसारः यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया गया है  या निरुद्ध किया गया है तो उसे अधिकार होगा कि उसकी गिरफ्तारी की सूचना उसके परिजनों, रिश्तेदार, मित्र या किसी परिचित को अवश्य भेजी जाए तथा गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी का क्या दायित्व होगा कि उसकी गिरफ्तारी की सूचना तत्काल उसके किसी परिजन, मित्र, रिश्तेदार या  परिचित को अवश्य दी जाए जिसका इन्द्राज रोजनामचा में भी किया जाएगा।

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