अन्वेषण की शक्तियां (Powers of Investigation)

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(Powers of Investigation)

अन्वेषण की शक्तियां

अन्वेषण के सम्बन्ध में अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी को दण्ड प्रक्रिया संहिता-1973 में व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं। संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचने रिपोर्ट प्राप्त होने पर घटनास्थल पर प्रस्थान करने से लेकर न्यायालय में पुलिस रिपोर्ट दाखिल करने तक अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी दण्ड प्रक्रिया संहिता-1973 द्वारा विवेचना के सम्बन्ध में प्रदत्त विभिन्न महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करता है जिनके अन्तर्गत घटना के चक्षुदर्शी, परिस्थितिजन्य व अनोपचारिक साक्षियों के कथन अंकित करता है, अभियुक्त की तलाश  करता है, गिरफ्तारी हेतु दविश देता है, गिरफ्तारी करता है। गिरफ्तारी न हो पाने की दशा में 82/83 दण्ड प्रक्रिया संहिता की कार्यवाही करता है। आवश्यकता पड़ने पर सम्बन्धित संदिग्ध व्यक्ति/ सम्पत्ति की कार्यवाही शिनाख्त कराता है। सम्पूर्ण अन्वेषण से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर अन्तर्गत धारा-173 दण्ड प्रक्रिया संहिता पुलिस रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करता है।

स्टेट आफ बिहार बनाम चन्द्रभूषण सिंह, AIR 2001 SC 429 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः रेलवे सम्पत्ति (अविधिपूर्ण कब्जा) अधिनियम 1966 की धारा-8 के अन्तर्गत रेलवे सुरक्षा बल के अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट धारा-173 दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रयोजनार्थ आरोप पत्र नही है।

एम0 बी0 थाड़ा बनाम स्टेट आफ गुजरात AIR 1969 SC 362 में न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः आरोप पत्र तथा अभियुक्त की गिरफ्तारी का प्रपत्र दोनों ही अन्वेषण के भाग हैं।

आर0 के0 डालमिया बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन AIR 1962 SC 1821 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः आरोप पत्र अभियोजन का पूर्ण तथा सही निबन्ध है।

सेन्ट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन बनाम आर0 एस0 AIR 2002 SC 1644 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः यद्यपि सम्बन्धित समस्त अभिलेख / दस्तावेज आरोप पत्र के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए परकन्तु इसका यह अभिप्राय नही है कि आरोप पत्र के बाद दस्तावेज पेश नही किए जा सकते। यदि कोई अभिलेख / दस्तावेज आरोप पत्र के साथ पेश नही किया जा सका है तो उसे बाद में भी पेश किया जा सकता है। धारा-173(5) दण्ड प्रक्रिया संहिता में वर्णित शब्द “भेजेगा” आज्ञापक नही है।

गुरुबचन सिंह बनाम स्टेट आफ पंजाब AIR 1957 SC 613 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है किः धारा-173(7) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार जहां पर मामले का अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी ऐसा करना सुविधापूर्ण समझे, वहां पर धारा-173(5) दण्ड प्रक्रिया संहिता में निर्दिष्ट सभी या किन्हीं दस्तावेजों का प्रतियां अभियुक्त को दे सकेगा, जैसा- कि विचारण के समय प्रस्तुत किए जाने वाले साक्षियों के कथनों की प्रतियां एवं ऐसे दस्तावेजों की प्रतियां जिन पर निर्भर करने का अभियोजन का विचार है।

सुपरिण्टेण्डेण्ट आफ रिमेम्ब्रेसर आईंफ लीगल अफेयर्स, वेस्ट बंगाल बनाम सत्येन भौमिक व अन्य AIR 1981 SC 917 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः शासन गुप्त अधिनियम- 1923 (Official Secrets Act 1923) की धारा 14 भी अभियुक्त को साक्षियों के कथनों, दस्तावेजों आदि की प्रतियां प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नही कर सकती है।

शंकर राम बनाम स्टेट AIR 1986 पटना 276 में न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः जहां पर किसी आरोप के लिए कई संयुक्त अभियुक्त व्यक्तियो के विरुध्द अन्वेषण किया जा रहा हो, वहां पर उनमें से किसी एक अथवा अधिक अभियुक्त के विरूध्द पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत की जा सकती है, भले ही सभी अभियुक्तों के विरुध्द अन्वेषण पूरा न हुआ हो।

सेन्ट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन बनाम राजेश गांधी AIR 1997 SC 93 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः जहां पर स्थानीय पुलिस द्वारा किया गया अन्वेषण सन्तोषप्रद नहीं है तो उस मामले का अन्वेषण किसी अन्य एजेन्सी द्वारा कराया जा सकता है।

असंज्ञेय मामलों में मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस अधिकारी अन्वेषण नही कर सकता है जिसके सम्बन्ध में धारा-155 दण्ड प्रक्रिया संहिता में प्राविधान किया गया है।

स्टेट आफ उड़ीसा बनाम शरत चन्द्र AIR 1997 SC में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है किः यह सत्य है कि असंज्ञेय मामलों का अन्वेषण मजिस्ट्रेट को आदेश के बिना पुलिस अधिकारी नही कर सकता है परन्तु जहां पर परिवाद से यह प्रकट होता है कि अभियुक्त द्वारा असंज्ञेय व संज्ञेय दोनों प्रकार का अपराध कारित किया गया है, वहां पर अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा दोनों प्रकार का अपराधों का अन्वेषण किया जा सकता है।

मधुबाला बनाम सुरेश कुमार (1997) 8 SCC 476: AIR 1997 SC 3104 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस अधिकारी को मामला (अभियोग) दर्ज किये जाने का आदेश दिया जा सकता है।

रमेशभाऊ पाण्डुराव हेड़ाऊ बनाम स्टेट आफ गुजरात AIR 2010 SC 1877 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान लेने से पूर्व धारा-156(3) Cr Pc  के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर सकता है एवं धारा-202 Cr Pc के अधीन प्रदत्त शक्तियो का प्रयोग प्रसंत्रान लेने के पश्चात तथा आदेशिका जारी करने से पूर्व कर सकता है।