विभिन्न न्यायालयों की दण्डादेश शक्तियां (Sentence Powers of Various Courts)

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भारतवर्ष में राज्य में उच्चतम स्तर पर उच्च न्यायालय तथा जिला स्तर पर सेशन न्यायालय, सहायक सेशन न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट एवं महानगर मजिस्ट्रेट स्थापित किये गये हैं जिनकी दण्डादेश शक्तियों का वर्णन दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 28 व 29 में वर्णित है जो कि निम्नलिखित हैंः

उच्च न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 28 (1) के अनुसारः उच्च न्यायालय विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी दण्डादेश दे सकता है।

सेशन न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 28 (2) के अनुसारः सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी दण्डादेश दे सकता है मृत्यु-दण्डादेश को उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट किया जाना आवश्यक है।

यदि उच्च न्यायालय द्वारा उक्त मृत्यु दण्डादेश पुष्ट नही किया जाता है तो सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा दिया गया उक्त मृत्यु दण्डादेश शून्य माना जायेगा।

सहायक सेशन न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 28 (3) के अनुसारः सहायक सेशन न्यायाधीश विधि द्वारा प्राधिकृत कोई ऐसा दण्डादेश दे सकता है जो मृत्यु दण्ड, आजीवन कारावास एवं दस वर्ष से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय न  हो।

अर्थात् दस वर्ष तक की अवधि के कारावास तक का दण्ड दे सकता है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 29 (1) के अनुसारः मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी ऐसा दण्ड दे सकता है जो कि मृत्यु दण्ड, आजीवन कारावास एवं सात वर्ष से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय न  हो।

अर्थात् सात वर्ष तक की अवधि के कारावास तक का दण्ड दे सकता है।

प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 29 (2) के अनुसारः प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट न्यायालय तीन वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास या पांच हजार रूपये तक के जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दे सकता है।

अर्थात् तीन वर्ष तक की अवधि के कारावास तथा पांच हजार रूपये तक के जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दे सकता है।

द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 29 (3) के अनुसारः द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट न्यायालय एक वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास या एक हजार रूपये तक के जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दे सकता है।

अर्थात् एक वर्ष तक की अवधि के कारावास तथा एक हजार रूपये तक के जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दे सकता है।

मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 29 (4) के अनुसारः मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट न्यायालय विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी ऐसा दण्ड दे सकता है जो कि मृत्यु दण्ड, आजीवन कारावास एवं सात वर्ष से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय न  हो।

अर्थात् मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट न्यायालय को वही शक्तियां प्राप्त हैं जो कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्राप्त हैं।

महानगर मजिस्ट्रेट न्यायालय की दण्डादेश शक्तियाःं

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 29 (4) के अनुसार- महानगर मजिस्ट्रेट न्यायालय तीन वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास या पांच हजार रूपये तक के जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दे सकता है।

अर्थात् महानगर मजिस्ट्रेट न्यायालय को वही शक्तियां प्राप्त हैं जो कि प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट न्यायालय को प्राप्त हैं।

रजनीकान्त केशव भण्डारी बनाम स्टेट ए0 आई0 आर0 1967 गोवा 21 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः यदि किसी हत्या के मामले में सेशन न्यायालय ने मृत्यु दण्ड का आदेश दिया तथा यदि ऐसी हत्या विचारपूर्वक की गई हो तो उच्च न्यायालय ऐसे मृत्यु दण्डादेश को पुष्ट कर देगा।

स्टेट आफ मध्य प्रदेश बनाम घनश्याम सिंह ए0 आई0 आर0 2003 ए0 सी0 3131 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः किसी मुकदमें का लम्बे समय तक विचाराधीन रहना कम दण्ड देने का आधार नही है। दण्डादेश पारित करते समय मामले के तथ्यों व परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए । दण्ड का मात्रा मामले प्रकृति, अपराध की गम्भीरता तथा अधियुक्त के आचरण पर निर्भर करती है।