डाक्टर या पुलिस अधिकारी द्वारा किसी घायल व्यक्ति का मृत्युकालिक कथन अंकित किया जाना (Dying declaration of any wound person recorded by any Doctor or Police Officer)

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मृत्युकालिक कथन अंकित किए जाने का प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा- 32(1) में किया गया है जिसके अनुसार यदि किसी मरणासन्न व्यक्ति ने कोई कथन लिखित या मौखिक रूप से अपनी मृत्यु के कारण के सम्बन्ध में या उस व्यवहार की किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में दिया है जिसके फलस्वरूप उसकी मृत्यु हुई है तो उक्त कथन उसकी मृत्यु के कारण के सम्बन्ध में की जाने वाली किसी भी कार्यवाही में सुसंगत है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा- 60 के अनुसार मौखिक साक्ष्य सीधी होनी चाहिए जो कहे कि उसने उक्त तथ्य देखा है और यदि सुनने से सम्बन्धित है तो ऐसे गवाह के साक्ष्य में यह तथ्य आना चाहिए कि वह यह कहे कि उसने खुद सुना किन्तु भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा- 32(1) के प्रावधान के अनुसार अपवादस्वरूप सीधी साक्ष्य, साक्षी की मृत्यु हो जाने के कारण उपलब्ध न होने के कारण मृत्युकालिक कथन को ही मान्यता प्रदान की गयी है।

मृत्युकालिक कथन को न्यायालय में मान्यता प्रदान करने का कारणः 

जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो रही होती है तो उसकी गम्भीर स्थिति को उसकी सच्चाई का आधार मानते हुए मृत्युकालिक कथन को शपथ और जिरह के नियम को छोड़ते हुए विश्वास किया जाता है। यही कारण है कि मृत्युकालिक कथन को न्यायालय में मान्यता प्रदान की गई है।

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मृत्युकालिक कथन कौन-कौन लिख सकता है

मृत्युकालक कथन डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, पुलिस या जनता का कोई व्यक्ति लिख सकता है।

मृत्युकालिक कथन कब-कब मृत्युकालिक कथन नहीं माना जाता है ?

(1) यदि मृत्युकालिक कथन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती है अर्थात वह मरने से बच जाता है तो उसके द्वारा किया गया कथन मृत्युकालिक कथन की श्रेणी में नहीं आता।

(2) यदि न्यायालय में विचारण के दौरान यह सिद्ध हो जाता है कि मृतक की मृत्यु घटना में आई चोटों के कारण नहीं हुई है तो उसका उक्त कथन स्वयं की मृत्यु के कारण के सम्बन्ध में दिया गया कथन मृत्युकालिक कथन नहीं माना जाता है।

पुलिस अधिकारी/विवेचक द्वारा मृत्युकालिक कथन अंकित करने की विधिः

यदि पुलिस थाने पर ऐसा कोई घायल एवं मरणासन्न व्यक्ति आता है जिसके सम्बन्ध में ऐसा प्रतीत होता है कि अस्पताल पहुंचने तक उसकी मृत्यु हो जाएगी तो उक्त घायल एवं मरणासन्न व्यक्ति का मृत्युकालिक कथन पुलिस अधिकारी द्वारा दो सम्भ्रान्त व्यक्तियों के समक्ष अंकित किया जाना चाहिए तथा उक्त कथन को पढ़कर सुनाने के बाद उक्त दोनों सम्भ्रान्त व्यक्तियों/साक्षियों तथा मरणासन्न व्यक्ति का हस्ताक्षर या निशानी अंगूठा लिया जाना चाहिए।

मृत्युकालिक कथन की प्रमुख विशेषताएंः

(1) मृत्यु कालिक कथन मौखिक या लिखित दोनों हो सकते हैं।

(2) मृत्युकालिक कथन के आधार पर न्यायालय द्वारा अभियुक्त को दण्डित किया जा सकता है चाहे उस कथन का समर्थन किसी अन्य साक्षी द्वारा किया गया हो या न किया गया हो परन्तु मृत्युकालिक कथन अपने आप में पूर्ण होना चाहिए। न्यायालय द्वारा निम्नलिखित तथ्यों पर विचार करने के उपरान्त ही मृत्युकालिक कथन के आधार पर किसी अभियुक्त को दण्डित किया जाता हैः

(a) क्या मृतक के पास घटना को देखने का पूर्ण अवसर था अर्थात यदि घटना रात की है तो किस प्रकाश के माध्यम से उसने अभियुक्त को देखा।

(b) कथन अंकित कराने में कोई विलम्ब हुआ या नहीं।

(c) कथन अंकित कराते समय मृतक की स्मरणशक्ति कैसी थी अर्थात क्या वह ऐसी दशा में था कि स्वयं के साथ घटित घटना का विवरण बता सके।

(3) मृत्युकालिक कथन प्रश्न करके उत्तर के रूप में लिखा जा सकता है।

(4) मृत्युकालिक कथन हूबहू उन्हीं शब्दों में लिखा जाए जो वह व्यक्ति बता रहा है।

(5) यदि मरणासन्न व्यक्ति बोलने में असमर्थ है तो इशारों से अपना बयान दे सकता है।

(6) यदि कोई घायल व्यक्ति अपनी मृत्यु के सम्बन्ध में या मृत्यु की परिस्थिति के सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कराता है तथा बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है तो उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट न्यायालय में साक्ष्य में मान्य है।

(7) यदि किसी मृतक ने जीवित रहते हुए पुलिस अधिकारियों कोकिसी व्यक्ति के विरुद्ध लिखित शिकायती प्रार्थना पत्र भेजा की उसे डर है कि उक्त व्यक्ति उसकी हत्या कर देगातथा बाद में उक्त व्यक्ति द्वारा उसकी हत्या कर दी गई तो उक्त प्रार्थना पत्र न्यायालय में मान्य होगा।

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