पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अन्तिम रिपोर्ट तैयार करना (FINAL REPORT PREPARED BY POLICE OFFICER)

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  • पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अन्तिम रिपोर्ट कब तैयार की जाती है ?

    किसी अभियोग की विवेचना के दौरान पर्याप्त साक्ष्य न मिलने,अभियुक्तों का पता न चलने,कार्यवाही शिनाख्त में गवाहों द्वारा अभियुक्तों या सम्पत्ति की पहचान न कर पाने या अभियोग झूठा पंजीकृत कराया जाना पाए जाने पर पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-173 के अनुसार अन्तिम रिपोर्ट तैयार कर न्यायालय प्रेषित की जाती है।

  • पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अन्तिम रिपोर्ट तैयार करते समय किन-किन बातों को ध्यान मे रखना चाहिए ?

पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा अन्तिम रिपोर्ट तैयार करते समय निम्नांकित बातों को ध्यान मे रखना चाहिएः

  • पुलिस अधिकारी (विवेचक) द्वारा किसी अभियोग में विवेचना के उपरान्त आरोप पत्र लगाने के बाद वादी को सूचित किया जाएगा।
  • यदि अभियोग झूठा पंजीकृत कराया जाना पाया गया है तो धारा-182 / 211 भारतीय दण्ड विधान संहिता की कार्यवाही हेतु अलग से रिपोर्ट प्रेषित की जाएगी।
  • सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध चोरी, लूट, डकैती इत्यादि कि अभियोग में अन्तिम रिपोर्ट लगाने के बाद अभियोग से सम्बन्धित माल किसी व्यक्ति के कब्जे से मिलने पर सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेकर पुनः विवेचना की जा सकती है।
  • किसी अपराध के अभियोग में अन्तिम रिपोर्ट लगाने से पूर्व विवेचक द्वारा सभी गवाहों का बयान अंकित किया आवश्यक है।
  • अन्तिम रिपोर्ट में उन सभी तथ्यों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाना चाहिए जिनके आधार पर अन्तिम रिपोर्ट लगाई जा रही है।
  • विवेचक द्वारा अन्तिम रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल किए जाने पर न्यायालय वादी मुकदमा को न्यायालय में बुलाकर सुने जाने के बाद अन्तिम रिपोर्ट स्वीकृत की जाती है। संतुष्ट न होने पर न्यायालय अन्तिम रिपोर्ट को निरस्त कर अपराध का विचारण भी कर सकता है।
  • अन्तिम रिपोर्ट में विवेचक दवारा सूचना की प्रकृति  तथा मामले की परिस्थितियों से परिचित गवाहों के नाम पते अवश्य अंकित किये जाएं।
  • अन्य एजेन्सी से विवेचना कराने की शक्तिः

स्टेट आफ बिहार चन्द्र भूषण सिंह ए0आई0आर0 2001 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसारः जहां पर किसी मामले में यह प्रतीत होता हो कि स्थानीय पुलिस द्वारा किया गया अन्वेषण सन्तोषप्रद नही है,वहां पर उस मामले का अन्वेषण किसी अन्य एजेन्सी द्वारा कराया जा सकता है।

  • पुलिस द्वारा अन्तिम रिपोर्ट दाखिल किये जाने के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली कार्यवाहीः

अभिनन्दन झा बनाम दिनेश मिश्र ए0 आई0 आर0 1968 एस0 सी0 117 : 1967 एस0 सी0 डी0 985 : 1968 ए0 ला0 ज0 373 : 1968 बी0 लां0 ज0 आर0 273 : क्र0 लां0 ज0 97 के अनुसारः जब धारा 173 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत पुलिस द्वारा अन्तिम रिपोर्ट न्यायालय में समर्पित/दाखिल की जाती है तो मजिस्ट्रेट ऐसी रिपोर्ट से सहमत या असहमत हो सकता है। सहमत होने पर अन्तिम रिपोर्ट स्वीकार कर सकता है तथा कार्यवाही बन्द कर सकता है। यदि अन्तिम रिपोर्ट से असहमत होता है तो अग्रेतर अनुसंधान के लिए निर्देश कर सकता है। धारा 156(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन पुलिस अधिकारी ऐसे अग्रेतर अनुसंधान कर एक अन्तिम आरोप पत्र समर्पित कर सकता है ।

  • अन्तिम रिपोर्ट वापस करने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश का अवैधानिक होनाः

जीवन सिंह बनाम स्टेट आफ राजस्थान 2004 क्रि0 लां0 ज0 3469 (राज0) के अनुसारः न्यायालय में एक बार प्रस्तुत की गयी अन्तिम रिपोर्ट इस आधार पर मात्र एक आवेदन पत्र के प्रस्तुत किए जाने पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अन्वेषण अधिकारी को वापस नही किया जा सकता था कि यह उसके उच्चतर अधिकारी के परिशीलन के लिए आवश्यक था। अतः अन्तिम रिपोर्ट को वापस करने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उक्त आदेश को अवैधानिक मानते हुए अपास्त कर दिया गया।

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  • राज्य सरकार अग्रेतर अनुसंधान का आदेश कर सकती हैः

स्टेट आफ बिहार बनाम जे0 ए0 सी0 सलधाना, 1980 क्रि0 लां0 ज0 89 : ए0 आई0 आर0 1980 एस0 सी0 326 के अनुसारः राज्य सरकार भारतीय पुलिस अधिनियम की धारा 03 के अधीन अधीक्षण करने की शक्तियों के प्रयोग में मामले के अग्रेतर अनुसंधान का निर्देश दे सकती है जिसमें दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(2) के अन्तर्गत रिपोर्ट समर्पित की गयी है ।

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