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झूठी प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस अधिकारी द्वारा की जाने वाली कार्यवाही (Opposite Action Of False F.I.R. Informer)

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समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पुलिस थानों पर किसी अपराध की झूठी सूचना देकर अभियोग पंजीकृत करा देते हैं। जब विवेचना/जांच से सिद्ध हो जाता है  कि वादी ने झूठी सूचना दी है या झूठी सूचना देकर प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई है तो भारतीय दण्ड  संहिता की धारा- 182 अथवा 211 के अनुसार पुलिस अधिकारी ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है।

पुलिस अधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा- 182 भारतीय दण्ड संहिता की कार्यवाही कब की जाती है ?

जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी लोक सेवक को झूठी सूचना इस आशय से देता है कि पुलिस अधिकारी (लोक सेवक) कोई कार्य या कार्य का लोप करे जो उक्त सूचना की सच्चाई मालूम होने पर न किया जाता या मिथ्या/झूठी सूचना इस आशय से देता है  कि पुलिस अधिकारी अपनी विधिक शक्ति का प्रयोग किसी को क्षति या क्षोभ पहुंचाने के लिए करें तब पुलिस अधिकारी द्वारा उक्त झूठी सूचना देने वाले व्यक्ति के विरुद्ध धारा- 182 भारतीय दण्ड संहिता की कार्यवाही की जाती है ।

धारा 182 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध के लिए दण्डः     

06 माह तक का कारावास या जुर्माना जो ₹1000 तक हो सकेगा या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

कुछ महत्वपूर्ण दृष्टान्तः

(1) रामू में पुलिस थाने पर पुलिस अधिकारी को जानबूझकर झूठी सूचना दी कि उसकी मोटरसाइकिल चोरी हो गई है जबकि वास्तविकता यह थी कि उसने कुछ दिन पूर्व अपनी मोटर साइकिल श्यामू को बेच दिया था। उसने यह झूठी सूचना जानबूझकर इस आशय से दी कि मोटर साइकिल क्रय करने वाले श्यामू के प्रति अध्यारोपण किया जाए। यहां पर रामू धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता का दोषी है ।

(2) रोहित पुलिस थाने पर जानबूझकर झूठी सूचना देता है कि अशोक ने अपने घर में लूट की बोलेरो गाड़ी रखा है तथा उक्त झूठी सूचना जानबूझकर इस आशय से देता है कि उक्त झूठी सूचना के फलस्वरुप पुलिस अधिकारी द्वारा अशोक के घर की तलाशी ली जाएगी जिससे अशोक को क्षोभ होगा। यहां पर रोहित धारा-182 भारतीय दंड संहिता का दोषी है।

पुलिस अधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा- 211 भारतीय दण्ड संहिता की कार्यवाही कब की जाती है ?

यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को यह जानते हुए कि उस व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही या आरोप के लिए कोई न्याय संगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, उस व्यक्ति को क्षति पहुंचाने की नीयत से उस व्यक्ति के विरुद्ध कोई दाण्डिक/आपराधिक कार्यवाही आरम्भ करता है या करवाता है या उस व्यक्ति पर कोई अपराध करने का मिथ्या आरोप लगाता है तो वह धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता का अपराध करता है जिसके लिए उसे 2 वर्ष तक के कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

परन्तु- यदि दाण्डिक कार्यवाही मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 7 वर्ष या उसे अधिक के  कारावास से दण्डनीय अपराध के  मिथ्या आरोप पर संस्थित/आरम्भ की जाती है तो उसे 07 वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

धारा 211 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध के लिए यह आवश्यक है कि वादी किसी निश्चित व्यक्ति के विरुद्ध झूठे अपराध की  प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखाए अथवा न्यायालय में वाद दायर करे ।

दृष्टान्त-   यदि कोई व्यक्ति अपना रिहायशी छप्पर  आग लगाकर जला देता है तथा किसी दूसरे व्यक्ति पर उक्त छप्पर में आग लगाकर जलाने के आरोप की प्रथम सूचना रिपोर्ट थाने में लिखाता है तो वह धारा-211 भारतीय दण्ड विधान का अपराध करता है ।

धारा 211 भारतीय दण्ड संहिता के आवश्यक तत्वः

(1) कोई दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करना या करवाना।

(2) ऐसा इस आशय से करना कि किसी व्यक्ति को क्षति कारित हो।

(3) किसी व्यक्ति पर यह मिथ्या आरोप लगाना कि उसने आपराध किया है।

(4) पूर्णतया यह ज्ञान होना कि उसके लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है।

झूठी रिपोर्ट लिखाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस  अधिकारी द्वारा की जाने वाली कार्यवाहीः

(1) सर्वप्रथम यह सिद्ध किया जाए कि रिपोर्ट झूठी है।

(2) यह भी सिद्ध करना आवश्यक है कि रिपोर्ट लिखाने वाले का आशय पुलिस को किसी कार्य या कार्य का लोप करने के लिए प्रोत्साहित करना  या  पुलिस को उसकी विधिपूर्ण शक्तियों का प्रयोग किसी को क्षति व क्षोभ पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित करना  या  किसी व्यक्ति को नामित करते हुए आपराधिक कृत्य किए जाने का आरोप लगाकर क्षति पहुंचाना था।

(3) वादी द्वारा लिखाए गए अभियोग के झूठा साबित हो जाने पर पुलिस अधिकारी (विवेचक) उसकी विवेचना अन्तिम रिपोर्ट लगाकर समाप्त करेगा तथा स्वीकृत किए जाने हेतु जुर्म खारिजा रिपोर्ट सहित सम्बंन्धित न्यायालय भेजेगा।

(4) पुलिस अधिकारी (विवेचक) अन्तिम रिपोर्ट के साथ ही धारा- 182 भारतीय दण्ड संहिता या धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता की रिपोर्ट भी तैयार करके सम्बन्धित न्यायालय प्रेषित करेगा।

(5) धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत न्यायालय द्वारा पुलिस अधिकारी (विवेचक) के परिवाद पर या थाना भारसाधक अधिकारी के परिवाद पर संज्ञान लेकर कार्यवाही की जा सकती है।

धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता तथा धारा- 211 भारतीय दण्ड संहिता में अन्तरः

(1) धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता में यह साबित किया जाना आवश्यक है कि दी गई मिथ्या सूचना बिना किसी युक्तियुक्त या संभाव्य कारणों से युक्त थी जबकि धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत मिथ्या आरोप में न्याय संगत या विधिपूर्ण  आधार नहीं था।

(2) धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत मिथ्या सूचना का इस आशय से दिया जाना आवश्यक है कि उसके आधार पर लोकसेवक कोई कार्य करे या कार्य का लोप करे जबकि धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत मिथ्या आरोप की कार्यवाही किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के आशय से की जाती है।

(3) धारा- 182 भारतीय दण्ड संहिता मिथ्या सूचना देते ही अपराध पूर्ण हो जाता है, लोक सेवक द्वारा उस पर कोई कृत्य किया जाना आवश्यक नहीं है जब की धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता में आरोप की कार्यवाही संस्थित करते ही दण्ड विधि गतिमान हो जाती है।

(4) धारा-182 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत मिथ्या सूचना देने वाले को उसके मिथ्या होने का ज्ञान होना आवश्यक है जबकि धारा-211 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत मिथ्या आरोप बिना किसी न्यायसंगत अथवा विधिपूर्ण आधार का होना आवश्यक है।

 

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